पीके खुराना

यदि किसी परिवार में पति-पत्नी दोनों नौकरीपेशा हैं तो एक तनख्वाह से घर चलाना और दूसरी तनख्वाह से व्यवसाय में निवेश करना आसान हो जाता है। एक बार जब व्यवसाय से इतनी सी आय होने लगे कि आपके घर का खर्च निकलना शुरू हो गया तो वह स्थिति ‘नौकरी से मुक्ति’ का चरण है, यानी

ऐसा क्यों है कि हमारे स्कूल-कालेज हमें सिर्फ रोजग़ार के लिए तैयार करते हैं, जीवन के लिए तैयार क्यों नहीं करते? हमारे शिक्षाविद क्यों नहीं सोचते कि जीवन जीने का कोई मैन्युएल तैयार करें और बच्चों को उसकी सीख दें? माता-पिता भी बचपन से ही जीवन की अहम बातों की सीख देना क्यों नहीं शुरू

उद्यमी, टीम को प्रशिक्षित करता है, उसे सामथ्र्यवान बनाता है और उनसे काम लेता है। एक उद्यमी जानता है कि कंपनी कितनी ही बड़ी हो, कर्मचारियों का आना-जाना लगा ही रहेगा। उसे मालूम है कि कोई कर्मचारी जब तक उसका कर्मचारी रहेगा तब तक वह बेहतर काम कर सके, उसके लिए उसका प्रशिक्षित होना जरूरी

अब कोरोना के कारण फिर से सवा दो करोड़ से अधिक लोगों की नौकरी चली गई है। बहुत से व्यवसायियों के साथ भी यही हुआ है कि उनका व्यवसाय बंद हो गया है। दरअसल हम किसी संकटकालीन स्थिति के लिए तैयारी ही नहीं करते और इसी का हश्र होता है कि जब संकट आता है

तराशा हुआ हीरा देखना आनंददायक अनुभव है, लेकिन एक डायमंड कटर से पूछिए। तराशा हुआ हीरा उसके किसी काम का नहीं क्योंकि उसमें उसके करने के लिए कुछ नहीं है। वह तो एक अनगढ़ हीरा देखकर उत्साहित होता है क्योंकि वह उसे तराश सकता है। एक कुम्हार कच्ची मिट्टी को देखकर खुश होता है क्योंकि

खेलों से रिटायर होने के बाद खिलाडि़यों की दशा अक्सर बहुत शोचनीय होती है और वो मकान खाली करवाने वाले, धमकी देने वाले, पैसे वसूल करवाने वाले, सैक्योरिटी गार्ड या बहुत हद तक डेयरी चलाने वाले और प्रापर्टी डीलर बनकर जीवन गुजारते हैं। डेयरी चलाना या प्रापर्टी डीलर बन जाना तो फिर अच्छी बात है,

डर के आगे जीत है। गरीबी डर से आगे निकलना सिखा देती है। यह गरीबी का ऐसा वरदान है जो अमीरों के नसीब में विरले ही मिलता है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे बहुत से प्रयोग हुए हैं जहां फूल बेचने वाले या खोमचा लगाने वाले युवकों को उच्च शिक्षा के साधन उपलब्ध करवाए गए

जब हम अपने फैसलों की ऐसी समीक्षा करेंगे तो हम बहुत सी नई बातें सीखेंगे, अपने गुरू स्वयं बनेंगे और भविष्य के लिए सही फैसले लेने में समर्थ हो सकेंगे। किसी भी फैसले के विकल्पों को और हर विकल्प के लाभ-हानियों के लिखित विश्लेषण का लाभ यह है कि एक साल बाद, पांच साल बाद,

जीवन में उतार-चढ़ाव आएंगे, कठिनाइयां आएंगी, अमीरी-गरीबी आएगी। तब दोनों कितना धीरज रखते हैं, कितना विश्वास रखते हैं खुद पर और अपने पार्टनर पर, इससे शादी या बच जाती है या टूट जाती है। रिश्ते धीरे-धीरे पकते हैं, धीरे-धीरे मजबूत होते हैं। हमारे समाज में यह आम प्रथा है कि बच्चे हो जाएं तो घर

इसका मतलब है कि हमारे रिश्तों में, हमारी पसंद-नापसंद पर निर्भर करता है कि हम किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा सामने लाए गए किसी नए तथ्य को स्वीकार करेंगे या नहीं करेंगे। सच यही है कि अक्सर तथ्य हमारे विचार नहीं बदलते, बल्कि किसी व्यक्ति पर हमारा विश्वास यह तय करता है कि हम अपने विचार