पीके खुराना

अब हम जान चुके हैं कि चैतन्य की ओर पहला कदम है जागरूकता। इसका अगला कदम रुचि है, यानी अपने आसपास की वस्तुओं तथा घटनाओं के प्रति जागरूक रहने तथा उनमें रुचि लेने का अभ्यास। इस समग्र प्रक्रिया से गुजर कर ही हम चेतन मस्तिष्क के मालिक हो सकते हैं और चेतनता से परम चैतन्य

हमारी शिक्षा प्रणाली अभी हमें डर के आगे की जीत का स्वाद चखने के लिए तैयार नहीं कर रही है। हमें यह समझना चाहिए कि परिवर्तन दिमाग से शुरू होते हैं, या यूं कहें कि दिमाग में शुरू होते हैं। राबर्ट कियोसाकी ने लिखा है कि जब मैं मोटा हो गया था और मैंने अपना

दुश्मनी में हमेशा डर का माहौल बना रहता है और सुरक्षा सदा दांव पर होती है। ध्रुवीकरण और बंटवारे से किसी समाज का भला नहीं हो सकता। हमें समझना होगा कि झूठ का प्रसार या समाज का बंटवारा सिर्फ नेताओं को फायदा पहुंचाता है, जनता का तो नुकसान ही होता है। कोई भी नेता, चाहे

ये दोष किसी एक व्यक्ति के नहीं हैं, ये प्रणालीगत दोष हैं। भारतवर्ष में लागू संसदीय प्रणाली इतनी दूषित है कि इसे बदले बिना इन कमियों से निजात पाना संभव नहीं है। इसकी तुलना में अमरीकी शासन प्रणाली बहुत बेहतर है। वहां राष्ट्रपति कानून नहीं बनाता, संसद कानून बनाती है। भारतवर्ष में यदि सरकार द्वारा

खुशी की बात यह है कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं में यह गुण मौजूद है और हिंदी का ही नहीं, पंजाबी, बंगाली, मराठी, असमिया, तमिल, तेलुगू आदि सभी भारतीय भाषाभाषियों का एक बड़ा वर्ग है जो प्रगतिशील है, आगे बढ़ रहा है तथा और भी आगे बढऩा चाहता है। उसे समृद्ध साहित्य चाहिए, पाठ्यपुस्तकें चाहिएं,

महत्वाकांक्षी होना गलत नहीं है, किसी भी चीज़ की अति होना गलत है। जब हम महत्वाकांक्षी हों और इस हद तक चले जाएं कि सारी संवेदनाएं, रिश्ते-नाते, दोस्तियां आदि भूल जाएं और सिर्फ अपनी स्वार्थ सिद्धि में लग जाएं तो हो सकता है कि कुछ देर के लिए हम सफल हो जाएं, ज्यादा लाभ कमा

छोटी-छोटी बातें हमारे स्वास्थ्य की रक्षा में अहम भूमिका निभा सकती हैं। सही ज्ञान के अभाव में सिर्फ पुराने विश्वासों पर चलते रहना या नई अस्वास्थ्यकर आदतें अपना लेना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता। गलत तरीके से मोबाइल फोन का प्रयोग अथवा सूर्य नमस्कार दोनों ही हमारे लिए हानिकारक हैं। स्वास्थ्य के बारे में

आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारे देश में प्रयोगधर्मी वातावरण बनने, बच्चों को प्रयोग करने और असफल होने की इज़ाज़त हो, असफलता को दाग मानने के बजाय सफलता की सीढ़ी माना जाए। असफलता को सम्मान दिया जाए, वरना असफलता से हम इतना डर जाएंगे कि सफलता के लिए प्रयत्न ही बंद कर देंगे।

मेरे एक मित्र एक कंपनी में चीफ टैक्नालॉजी आफिसर हैं। उन्हें बचपन से ही सवाल पूछने और नई बातें सीखने की शिक्षा मिली थी। नौकरी के लिए इंटरव्यू के समय उन्होंने यूं ही पूछ लिया कि वो हफ्ते में सिर्फ तीन दिन काम करना चाहते हैं, तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके नियोक्ता ने

याद रखिए, दृढ़ता और अडिय़लपन के बीच एक महीन रेखा है, परंतु यह रेखा न केवल है बल्कि लगातार आत्मनिरीक्षण से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। अति हर चीज की बुरी है। अडिय़लपन और कडिय़लपन तभी तक जायज है, जब तक वह कैद न बन जाए। इसी तरह छूट की भी एक सीमा