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यह बात भी महत्वपूर्ण है कि जीएसटी का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए पेट्रोल, डीजल, बिजली और प्राकृतिक गैस जैसी वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाना अभी बाकी है। जीएसटी से बाहर रखी वस्तुओं पर स्पष्ट खाका बने...

हिमाचल प्रदेश में अभी तक वह वातावरण ही नहीं बन पा रहा है जिससे हम अपने स्टार खिलाडिय़ों का पलायन रोक सकें। जब खिलाड़ी को सुविधा नहीं मिलेगी तो उसे फिर कैसे रोका जा सकता है। कोई भी पढ़ाई या परीक्षा पहले अपने लिए, फिर देश के लिए, मगर खेल केवल व केवल देश के लिए होता है। वहां जब खिलाड़ी जीतता है तो उस देश का झंडा सबसे ऊपर उठता है और उस देश की धुन पूरा विश्व आदर के साथ सुनता है। हिमाचल में ओलंपियन व एशियाई पदक विजेता मुक्केबाज आशीष चौधरी को उसका विभाग प्रशिक्षण के लिए फ्री नहीं रख रहा था। बहुत प्रयास करने बाद ही उसे प्रशिक्षण के लिए भेजा। खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के लिए आठ से दस साल का लगातार प्रशिक्षण कार्यक्रम चाहिए होता है।

राहुल गांधी अन्तत: उच्चतम न्यायालय पहुंचे। लेकिन साधारण व्यक्ति की तरह नहीं। पूरा जुलूस लेकर। ट्रक में बैठकर। ट्रक में से किसी को धक्के देकर उतारा जा रहा है। पैदल चलो। किसी को हाथ पकड़ कर ऊपर खींचा जा रहा है। किसी को कोहनी मारी जा रही है, किसी से कोहनी मरवाई जा रही है। साथ साथ कुछ वकील भी चल रहे हैं। नारे लगा रहे हैं, चिल्ला रहे हैं। लो! एक के मुंह पर राहुल गान्धी ने चमगादड़ का चेहरा लगा दिया है। किसी ने पूछा, राहुल गान्धी कहां जा रहे हैं? पता चला उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करने जा रहे हैं। चिल्ला रहे हैं। लोग हैरान हैं, ट्रक के ऊपर और उसके आजू बाजू जो लोग चिल्ला कर जा रहे हैं, ये आखिर कौन हैं? उत्तर राहुल गान्धी ही देते हैं, हमारी तो यह शिवजी की बारात है। कोई भी कुत्ता-बिल्ली इसमें शामिल हो सकता है। ऊपर वाले भी और नीचे वाले भी हैरान हो रहे हैं। राजकुमार ने ऐसा किसके बारे में कहा? लेकिन पूछ कोई नहीं रहा। यदि पूछ लिया तो न जाने राजकुमार किस का नाम ले लेंगे...

श्रीमद्भगवद्गीता हमें यही स्मरण कराती है कि जीवन को गति और विश्राम, दोनों की आवश्यकता है। केवल दौड़ ही जीवन नहीं है, ठहरना भी उतना ही आवश्यक है। ठहरना कोई हार नहीं, बल्कि चेतना की वापसी है। जब हम ठहरते हैं, तब हम देखते हैं कि हमने क्या पाया, क्यों पाया, और उसकी कीमत क्या चुकाई। रजोगुण का संतुलन सत्त्व की ओर झुकने से ही संभव है, जहां कर्म तो होता है, पर अहंकार नहीं, प्रयास होता है, पर बेचैनी नहीं, लक्ष्य होता है, पर अंधापन नहीं। यदि मनुष्य यह समझ ले कि असली सफलता बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक शांति में है, तो दौड़ अपने आप सहज हो जाती है। तब जीवन ‘भागो, भागो, भागो’ की चीख नहीं रहता, बल्कि एक सजग यात्रा बन जाता है। कर्म करो, पर कर्म में ऐसे न डूबो कि जीवन में कुछ और न बचे...

भारत के लोकतंत्र की रक्षा केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाकर दूसरे को नियुक्त करने या हर विवादास्पद चुनावी फैसले को एक अलग राजनीतिक लड़ाई के रूप में चुनौती देने से नहीं हो सकती। विपक्ष को दो परस्पर पूरक सुधारों के लिए अभियान चलाना चाहिए। पहला, मतदाता सूचियों के रखरखाव और अद्यतन की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया जाए, जबकि राष्ट्रीय मानक और निगरानी की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के पास रहे। दूसरा, निर्वाचन आयोग में नियुक्तियों को लेकर केंद्र सरकार के निर्णायक प्रभाव को समाप्त किया जाए। असल सुधार किसी एक अधिकारी को बदलने में नहीं, बल्कि उस संस्थागत व्यवस्था को बदलने में है जो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है...

देश के प्रमुख वस्त्र उत्पादन केंद्रों में आज भी कुशल कारीगरों और तकनीशियनों की पर्याप्त कमी महसूस की जा रही है। साथ ही, कपास का एक प्रमुख उत्पादक देश होने के बावजूद भारत की प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादकता वैश्विक औसत से काफी नीचे है...

प्रदूषण केवल औद्योगिक स्थल तक ही सीमित नहीं रह सकता, क्योंकि प्रदूषित हवा और पानी आसपास और नदी के माध्यम से नीचे दूर तक पहुंच जाता है। इसलिए पंजाब तक यह खतरा फैलता जा रहा है...

हर व्यक्ति का स्वाभाविक स्वरूप दयालु, प्रेमपूर्ण, करुणामय और आनंदमय होता है। कोई भी बच्चा बिना कारण नहीं रोता। वह तब रोता है, जब उसे भूख लगी हो, नींद आ रही हो या वह भयभीत हो। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति हिंसक है, तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यदि किसी

चाहिए तो यह था कि इस टाइमगैप अरेंजमेंट काल में राजकुमार को पढऩे के लिए पंचतंत्र दिया जाता। लेकिन वह वक्त तो राजकुमार ने मनमोहन सिंह द्वारा बनाए अधिनियमों को सार्वजनिक रूप से फाड़ कर अपनी झूठी शक्ति का प्रदर्शन करने में लगा दिया। अब राजवंश में हडक़म्प मचा हुआ है। राजकुमार की उम्र बढ़ती जा रही है। राजमाता की तबीयत ठीक नहीं रहती। समय हाथ से निकला जा रहा है। लगता है अब दरबारियों ने समझाया है कि घर बैठने या विदेश में जाते रहने से कुछ नहीं बनेगा। सदा सडक़ों पर घूमा करो। आम लोग जैसा बनने की कोशिश करो...