Divya Himachal Logo Sep 25th, 2017

आस्था


आध्यात्मिक ज्ञान

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

बाह्या इंद्रियां शरीर के विभिन्न भागों में स्थित दृश्य अंग हैं, अंतःइंद्रियां अस्पृश्य हैं। हमारे नेत्र, कान, नाक आदि बाह्या हैं  और उनसे संगत अंतःइंद्रियां हैं। हम निरंतर इंद्रियों के इन दोनों वर्गों के संकेतों पर नाचते हैं। इंद्रियों के समानुरूपी इंद्रिय विषय हैं। यदि कोई इंद्रिय विषय निकट होते हैं, तो इंद्रियां हमें उनका अनुभव करने को विवश करती हैं, हमारी कोई इच्छा अथवा स्वतंत्रता नहीं होती। यह एक बड़ी नाक है और वहां तनिक भी सुगंध है तो मुझे वह सूंघनी पड़ती है। यदि गंध बुरी होती, तो मैं अपने से कहता, इसे मत सूंघो पर प्रकृति कहती है ‘सूंघ’, और मैं सूंघता हूं। तनिक सोचो तो, हम क्या हो गए हैं। हमने अपने को बांध लिया है। मेरी आंखें हैं, कुछ भी हो रहा हो, अच्छा या बुरा, मुझे देखना होगा। सुनने के साथ भी यही बात है। यदि कोई मुझसे बुरी तरह बोलता है, तो वह मुझे सुनना होगा। मेरी श्रवणेइंद्रिय मुझे यह करने को बाध्य करती हैं और मुझे कितना दुख अनुभव होता है। निंदा अथवा प्रशंसा मनुष्य को सुननी पड़ेगी। मैंने बहुत से बहरे मनुष्य देखें हैं, जो आमतौर पर नहीं सुन पाते, पर यदि बात उनके बारे में होती है, तो वह सदा सुन लेते हैं! ये सब इंद्रियां  अंतः और बाह्या, शिष्य के नियंत्रण में होनी चाहिए। कठिन अभ्यास के द्वारा उसे ऐसी अवस्था में पहुंच जाना चाहिए, जहां वह अपने मन द्वारा इंद्रियों का, प्रकृति के आदेशों का, सफल विरोध कर सके। वह अपने मन से यह कह सकें ‘तुम मेरे हो, मैं तुम्हें कुछ न देखने की अथवा न सुनने की आज्ञा देता हूं’ और मन न कुछ देखे, न कुछ सुने। मन पर किसी रूप अथवा ध्वनि की प्रतिक्रिया न हो। इस अवस्था में मन इंद्रियों के अधिकार से मुक्त हो चुका होता है, उनसे अलग हो चुका होता है। अब वह इंद्रियों और शरीर से आबद्ध नहीं रहता। बाह्य वस्तुएं अब मन को आज्ञा नहीं दे सकती। मन अपने को उनसे जोड़ना स्वीकार नहीं करता। वहां सुंदर गंध है। शिष्य मन से कहता है, मत सूंघो और मन गंध का अनुभव नहीं करता। जब तुम ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हो, तभी तुम शिष्य बनना आरंभ करते हो। इसीलिए जब प्रत्येक मनुष्य कहता है, ‘मैं सत्य को जानता हूं।’ तो मैं कहता हूं। यदि तुम सत्य हो जानते हो, तो तुममें आत्म नियंत्रण होना चाहिए और यदि तुममें आत्म नियंत्रण है, तो उसे इन इंद्रियों के नियंत्रण के रूप में प्रकट करो। इसके बाद मन को शांत करना चाहिए। वह इधर-उधर भटकता रहता है जब मैं ध्यान के लिए बैठता हूं। तो मन में संसार के सब बुरे से बुरे विषय उभर आते हैं। मतली आने लगती है। मन ऐसे विचारों को क्यों सोचता है, जिन्हें मैं नहीं चाहता कि वह सोचे? मैं मानो मन का दास हूं। जब तक मन चंचल है और वश से बाहर है, तब तक कोई आध्यात्मिक ज्ञान संभव नहीं है। शिष्य को मनोनिग्रह सीखना है। हां, मन का कार्य सोचना है। पर यदि शिष्य नहीं चाहता, तो उसे सोचना नहीं चाहिए, जब वह आशा दे, तो सोचना बंद कर देना चाहिए। शिष्यता का अधिकारी बनने के लिए मन की यह स्थिति बहुत आवश्यक है और शिष्य की सहनशक्ति भी महान होनी चाहिए।

September 23rd, 2017

 
 

श्रद्धा तो ज्योति है

बाबा हरदेव तत्त्व ज्ञानियों का कथन है कि ‘श्रद्धा’ अकारण है, इसमें वासना, कामना और तृष्णा नहीं होती। ‘श्रद्धा’ उपकरण नहीं है, बल्कि श्रद्धा अखंड चेतना की श्वास है। श्रद्धा कोई संकल्प भी नहीं है और न श्रद्धा कोई ठहरी हुई घटना है, यह तो […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

ध्यान की गहराइयां

श्रीश्री रवि शंकर श्री कृष्ण गीता में कहते हैं, आप  तब तक योग की स्थिति को उपलब्ध नहीं हो सकते, जब तक आपके अंदर की इच्छाएं समाप्त नहीं हो जातीं। आप इस बात को अपने अनुभव से भी देख सकते हैं। जब आप नींद के […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

भक्ति का भाव

सद्गुरु  जग्गी वासुदेव भक्ति कुदरत की तरह है। कुदरत देने में कंजूसी नहीं करती, वह हर चीज में अपने आपको पूरी तरह से समर्पित कर देती है। कुदरत की हर चीज अपनी पूरी क्षमता से देना जानती है। जबकि मनुष्य बचत करने का प्रयास करता […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

कुंडलिनी की अवस्थिति

नाभि-मंडल में सूर्य का निवास है। सूर्य और चंद्र दोनों अधोमुखी हैं। सूर्य इस अमृतमयी शक्ति को जलाता और नष्ट करता रहता है। वास्तव में आकाश में चमकने वाली बिजली के समान इस शरीर के अंदर भी एक अग्नि है… साधना और तंत्र-मंत्र में कुंडलिनी […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

बच्चों में डर

ओशो बच्चा भयभीत हो जाता है और जब अपनों से इतना डर है तो परायों का तो कहना ही क्या! जब अपनों पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता कि हर घड़ी प्रेम मिलेगा, तो दूसरों का तो क्या भरोसा! फिर बच्चा बड़ा होता है, […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

अजूबे से कम नहीं हैं खजुराहो के मंदिर

भारत में ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा देखे और घूमे जाने वाले पर्यटक स्थलों में अगर कोई दूसरा नाम आता है तो वह है खजुराहो। खजुराहो भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

दादी मां के नुस्खे

* रक्त को साफ  करने यानी रक्त शुद्धि के लिए शहद का सेवन करना चाहिए। * शहद में विटामिन ए, बी, सी, आयरन, कैल्शियम, सोडियम, फास्फोरस, आयोडीन पाए जाते हैं। रोजाना शहद का सेवन शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और ताजगी पैदाकर रोगों से लड़ने की […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

व्रत में एनर्जी देंगे ये ड्रिंक्स

हल्के गुनगुने पानी में नींबू और शहद मिलाकर पीने से आप दिनभर तरोताजा और ऊर्जावान बने रह सकते हैं। हर दिन सुबह खाली पेट इसका प्रयोग करने से आप दिन भर थकान महसूस नहीं करते और सक्रिय बने रहते हैं… नवरात्र में व्रत रखने के […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 

दृष्टिकोण का फर्क

श्रीराम शर्मा हर मनुष्य की अपनी एक दुनिया है। वह उसकी अपनी बनाई हुई है और वह उसी में रमण करता है। दुनिया वस्तुतः कैसी है?  इसका एक ही उत्तर हो सकता है कि वह जड़ परमाणुओं की नीरस और निर्मम हलचल मात्र है। यहां […] विस्तृत....

September 23rd, 2017

 
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