प्रो. सुरेश शर्मा ,लेखक नगरोटा बगवां से हैं

वर्तमान स्थिति में सभी को अपना मानसिक, मनोवैज्ञानिक, संवेगात्मक, आर्थिक तथा सामाजिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है… किसे पता था कि कोरोना जैसा दानव दुनियां के लोगों की हंसती-खेलती जि़ंदगी में एक तूफान सा पैदा कर देगा। क्या ख़बर थी कि यह महामारी लाखों लोगों को मौत का ग्रास बना लेगी। किसी को भी

प्रदेश स्तर पर एक बहुत ही मजबूत सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता है जिसमें कला एवं संस्कृति के विकास तथा उत्थान के साथ सभी कलाओं के कलाकारों को आर्थिक रूप से समृद्ध एवं सबल बनाने की जरूरत है… लगभग एक वर्ष से कोरोना समाप्ति की प्रतीक्षा करते हिमाचली कलाकारों की आशाओं पर एक बार फिर से

इन गीतों की धुनों में हम अपनी लोकसंस्कृति, लोक सहित्य तथा लोकसंगीत को अपने हृदय के अन्तःकरण से महसूस करते हैं। इन लोक परंपराओं को सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूप से बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्योंकि ये केवल विशेष पर्व या महीने पर गाए जाने वाले मात्र गीत ही नहीं, बल्कि एक समुदाय की परंपरा

लोक कलाओं को ढो रहे परंपरागत तथा पुश्तैनी कलाकारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। विभिन्न कलाओं को आगे बढ़ाने में समाज के सभी धर्मों, वर्गों, जातियों का योगदान रहता है। इन्हें आर्थिक संरक्षण दिए जाने की नितांत आवश्यकता है। प्रदेश में विभिन्न कलाकारों एवं कलाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य से

17वीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा दिल्ली में बनाया गया लाल किला हमेशा ही सत्ता और शक्ति का प्रतीक रहा है। यह किला देश की आन-बान और शान को प्रकट करता है। यह ऐतिहासिक स्मारक विश्व धरोहर की सूची में शामिल है और भारत के मुख्य पर्यटन स्थलों में से एक है। 26 जनवरी

शिक्षण संस्थान एक बार पुनः खोलने की अधिसूचना से नई उमंग, आशाओं तथा नई उम्मीदों का संचार हुआ है। सभी विद्यार्थी, अभिभावक, अध्यापक शिक्षण संस्थान खोलने की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। कुछ ही दिनों में प्रदेश के सभी शिक्षण संस्थानों में चहल-पहल होगी… हिमाचल प्रदेश के सभी शिक्षण संस्थानों में एक बार फिर

समाज में प्रतिभाशाली, शिक्षित तथा व्यवहार कुशल लोगों को समाज सेवा के माध्यम से राजनीति के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। यह दीन-दुखियों, पीडि़तों, वंचितों तथा शोषितों  के आंसू पोंछने  का एक माध्यम है। संपूर्ण हिमाचल प्रदेश में 17, 19 तथा 21 जनवरी 2021 को पंचायती चुनाव रूपी एक पंचवर्षीय महायज्ञ हो रहा है। इसमें

कोरोना ने कई मानसिक अवसादों, शारीरिक रोगों, चिंताओं तथा आशंकाओं को दावत दी है। इस प्राकृतिक आपदा ने दुनिया के प्रकृति प्रेमियों, पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों तथा शिक्षाविदों तथा राजनीतिज्ञों को दहला कर आत्मचिंतन के लिए विवश कर दिया है। कोरोना वायरस संक्रमण की घटना विश्व के मानवीय इतिहास की सबसे दुखद एवं पीड़ादायक घटना है।

हिमाचल प्रदेश में सर्दी का मौसम अपने यौवन पर है। संभावित है कि इस मौसम में जुकाम, बुखार, गले में खराश, शरीर में जकड़न से संबंधित रोग आने वाले समय में पांव पसारेंगे। कुछ समय से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में बहुत बड़ा विस्फोट हुआ है। हमें मानसिक रूप से इस बारे में और अधिक

प्रो. सुरेश शर्मा लेखक नगरोटा बगवां से हैं पहाड़ी बोली में बोलना असभ्य होना ही माना जाता है। युवा माता-पिता अपने घर पर पहाड़ी बोलने पर पूरा परहेज करते हैं तथा बच्चों पर भी प्रतिबंध लगा देते हैं। पहाड़ी मां तथा हिंदी मां की तबीयत ठीक नहीं है। अब ‘पहाड़ी बोली बचाओ सप्ताह’ मनाए जा