
संसद द्वारा दैनिक मूल्यांकन के लिए अंबेडकर की पैरवी में जो भी थोड़ा-बहुत व्यावहारिक या मूल्यवान था, वह भी तब समाप्त हो गया जब भारत ने दलबदल विरोधी कानून अंगीकार कर लिए। वर्ष 1985 के संविधान संशोधन ने सांसद के लिए पार्टी के फरमान के खिलाफ वोट देना अवैध बना दिया। अब अगर बहुमत पार्टी
भानु धमीजा सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ संसदीय प्रणाली की पसंद दरअसल एक राजनीतिक पार्टी का निर्णय था। यह 1946 की गर्मियों में कांगे्रस पार्टी की एक मीटिंग के दौरान लिया गया था। उसके बाद एक पार्टी के निर्देश के रूप में इसे संविधान निर्माण प्रक्रिया से लागू किया गया। संविधान सभा के लिए कांगे्रस ने नेहरू
ट्रंप और मोदी के मध्य यह तुलना दर्शाती है कि जहां एक अमरीकी राष्ट्रपति को अंधाधुंध दौड़ने से तुरंत रोक दिया जाता है, एक भारतीय प्रधानमंत्री अपने समूचे कार्यकाल के दौरान मनमानी जारी रख सकता है। यह दो शासन प्रणालियों के बीच एक बुनियादी अंतर के कारण है। अमरीकी राष्ट्रपति प्रणाली शक्तियों को कइयों में
भानु धमीजा सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं टाटा लिटरेचर लाइव 2018 (मुंबई लिटफेस्ट) में नवंबर 15, 2018 को ‘भारत को राष्ट्रपति प्रणाली की आवश्यकता है’ विषय पर एक बहस का आयोजन हुआ। इस अवसर पर प्रस्ताव के पक्ष में भानु धमीजा ने कमान संभाली। प्रस्तुत
भानु धमीजा सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं निसंदेह हिंदुओं को एकजुट करना कठिन है। जैसा भागवत ने कहा, ‘‘वे कभी साथ नहीं आते, कभी साथ नहीं रहते, वे कभी साथ मिलकर काम नहीं करते। हिंदुओं का साथ आना अपने आप में ही एक कठिन कार्य
संसदीय प्रणाली की वर्ष 1937 की इस असफलता के कारण ही पाकिस्तान का जन्म हुआ। इस प्रणाली की केवल बहुमत सरकारों की धारणा ने लीग के संघर्ष को अर्थहीन बना दिया। क्योंकि भारत में मुस्लिम अल्पमत की स्थिति बदलने वाली नहीं थी, इसलिए लीग हमेशा विपक्ष में बैठने को अभिशापित थी। पाकिस्तान, जो अब तक
हम ढुलमुल भारतीयों ने विपरीत दिशा पकड़ी, और केंद्रीकृत सरकार की ब्रिटिश किस्म को अपना लिया। हमने कई अमरीकी सिद्धांतों — संघवाद, राष्ट्रपति पद, न्यायिक समीक्षा, अधिकार-अधिनियम, आदि — को ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में जोड़ने का प्रयास किया। परंतु क्योंकि ऐसा मिश्रण असंगत और मूल में ही विपरीत था, वे सभी सिद्धांत समय के साथ
हमारे विकल्प ये हैंः वर्तमान धर्मनिरपेक्षता जारी रखें, अमरीका जैसी धर्मनिरपेक्षता अपनाएं, धर्म राज्य की स्थापना करें, या कुछ नया तैयार करें। भारत की मौजूदा स्थिति, जहां सरकार खुलकर धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो सकती है, स्पष्टतया कामयाब नहीं है। इससे हर तरफ तुष्टिकरण, वोट-बैंक की राजनीति और आक्रोश पैदा हुआ है। परंतु धर्म राज्य
उपाध्याय जीवन पर्यंत हमारे संविधान के आलोचक रहे। वर्ष 1965 में उन्होंने अपने ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) के सिद्धांतों के तहत इसे बदलने की अपनी योजना प्रस्तुत की। एक नए भारत, ‘धर्म राज्य’ के विषय में उनके विचार भाजपा द्वारा इसके आधिकारिक दर्शन के तौर पर अंगीकृत कर लिए गए। आज दिन तक पार्टी उपाध्याय