
एक साथ चुनावों के बारे में एक सामान्य गलतफहमी यह है कि वे अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली के समान हैं। यह बात सच्चाई से बहुत दूर है। समिति ने केवल छह देशों (दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, फिलीपींस आदि) की चुनाव प्रणाली का अध्ययन किया, लेकिन ब्रिटेन या संयुक्त राज्य अमेरिका का नहीं...
राहुल गांधी की टिप्पणी को हटाने में बिड़ला का पक्षपात पूरे प्रदर्शन पर था। उन्होंने सत्तारूढ़ दल की नीतियों और विचारधारा पर एक विपक्षी नेता के हमले को थोक में हटाने का आदेश दिया। लोकसभा का नियम 380, जो स्पीकर को ऐसा करने का अधिकार देता है, सत्तारूढ़ दल के हाथ एक सत्तावादी उपकरण है...
यही कारण हैं कि संसद बहस के लिए निरर्थक हो चुकी है। इतिहास बताता है कि हमारी संसद दशकों से बिना बहस के कानून पारित करती रही है। कुछ उदाहरणों पर गौर करें : 1990 में चंद्रशेखर सरकार ने दो घंटे से भी कम समय में 18 विधेयक पारित किए; 2001 में 32 घंटों में 33 बिल पारित किए गए; 2007 में लोकसभा ने 15 मिनट में तीन विधेयक पारित किए; 2021 में 20 विधेयक बिना किसी बहस के पारित हुए। स्वाभाविक है कि लोकसभा की बैठकों में भी कमी आई है। यह 1952-70 में प्रत्येक वर्ष 121 दिनों के लिए बैठती थी, लेकिन अब औसत केवल 68 दिन है...
अमरीका को ऐसे किसी भी संवैधानिक बदलाव से बचना चाहिए जो शक्तियों के इस सुंदर संतुलन को बदले। अमरीकी सिस्टम की कुछ विशेषताओं पर अकसर ‘अलोकतांत्रिक’ होने के रूप में हमला किया जाता है। जैसे कि इलेक्टोरल कॉलेज, सेनेट का सभी राज्यों को समान वोट और फिलिबस्टर नियम। परंतु उन्हें खत्म करने से सरकार की शक्तियां कुछ ही हाथों में समाहित हो जाएंगी। विश्वास बनाए रखो, अमरीका। आपका लोकतंत्र बिल्कुल सही चल रहा है...
ये बदलाव — मंत्रालयों पर बहुमत का नियंत्रण खत्म करना; पंचायतों और स्थानीय सरकारों को वास्तविक स्वतंत्रता देना; राष्ट्रपति और राज्यपालों का सीधे चुनाव करना; कार्यकारी प्राधिकार की जांच करने और सरकारों को धार्मिक गतिविधियों से रोकने के लिए विधायिका के दूसरे सदन का उपयोग — करने से भारत के शासन में काफी सुधार होगा। ये लगभग सभी सुधार संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रचलित राष्ट्रपति प्रणाली की अंतर्निहित विशेषताएं हैं। भारत साहसपूर्वक उस प्रणाली को पूरी तरह से अपना
संसदीय प्रणाली इस स्थिति को और गंभीर बना देती है जब यह बहुमत पार्टी के नेता को मंत्री चुनने की खुली छूट देती है। इससे अकसर सांप्रदायिक सरकार का निर्माण होता है। मणिपुर के मुख्यमंत्री स्वयं एक मैतेई हैं और उन्होंने अपने विश्वासपात्रों व अंतरंग मित्रों को चुन-
धार्मिक समानता और नागरिक सद्भाव प्राप्त करने के लिए तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता केंद्र और राज्य सरकारों को किसी भी धार्मिक गतिविधि में शामिल होने से रोकना है। यहीं पर भारत सबसे अधिक विफल रहता है। हमारे संविधान में अमेरिका के पहले संशोधन के समकक्ष का अभाव है, जो ‘‘धर्म की स्थापना’’ के किसी
यह राव ही थे जिन्होंने वर्ष 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत भारतीयों को वास्तविक अधिकार देने के लिए ब्रिटिश सरकार को मनाया था। इस कानून ने भारतीयों को पहली बार अपनी प्रांतीय सरकारें बनाने की अनुमति दी, परंतु अंग्रेज उन्हें कोई संप्रभु अधिकार देने के प्रति अनिच्छुक थे। राव का तर्क था
गवर्नरों पर संविधान की खामोशी पर बीआर अंबेडकर इतने उत्तेजित थे कि उन्होंने संपूर्ण दस्तावेज की भत्र्सना कर दी। संविधान अंगीकृत करने के मात्र तीन वर्ष उपरांत उन्होंने राज्यसभा में तर्क दिया कि गवर्नरों को स्पष्ट अधिकार देने के लिए संविधान संशोधित किया जाए। ‘‘हमें यह विचार विरासत में मिला है कि गवर्नर के पास