भानु धमीजा

ये ढांचागत चुनौतियां — स्थानीय स्वायत्तता, और केंद्र में शक्तियों के बंटवारे की आवश्यकता — विभाजन से पहले ही स्पष्ट थीं। 1937 में जब अंग्रेजों ने पहली बार भारतीयों को स्वयं प्रांतीय सरकारें बनाने की अनुमति दी, सांप्रदायिक एकता चकनाचूर हो गई थी। जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में चुनावों में कांग्रेस को बड़ी जीत

भानु धमीजा सीएमडी, दिव्य हिमाचल व्यक्तियों के ऐसे छोटे समूहों को समस्त शक्ति सौंपने का दोष हमारे नागरिकों या राजनेताओं को नहीं बल्कि हमारे संविधान को जाता है। यह हमारी सरकार को केंद्रीकृत करता है, हमारी पार्टियों को नियंत्रित करने में असफल है और एक शक्तिहीन संघीय ढांचे का निर्माण करता है… यह अब स्पष्ट

भानु धमीजा सीएमडी, दिव्य हिमाचल बहुत से भारतीयों की यह गलत धारणा है कि अमरीकी राष्ट्रपति के पास असीमित शक्तियां होती हैं, और एक भारतीय प्रधानमंत्री को नियंत्रणों और संतुलनों के बीच काम करना होता है। सच्चाई इससे बिलकुल उलट है। अमरीका के राष्ट्रपति को एक वास्तव में स्वतंत्र विधायिका, 50 स्वतंत्र राज्य सरकारों, संघीय

भानु धमीजा सीएमडी, दिव्य हिमाचल अमरीकी प्रणाली ने ट्रंप को केवल कई मनमाने कार्य करने से ही नहीं रोका, इसने रोजमर्रा उनसे उत्तर भी मांगा। वह 30 से अधिक विभिन्न जांचों का सामना कर रहे हैं, जिनकी निगरानी अदालतें या अमरीकी विधायिका कर रही है। रूस के साथ मिलीभगत के आरोपों की विशेष जांच, जिसे

भानु धमीजा सीएमडी, दिव्य हिमाचल गांधी ने शक्ति के केंद्रीकरण के खतरों को ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से पहचाना था। 1909 में उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा कि इंग्लैंड की संसद ‘‘एक बांझ स्त्री और एक वेश्या की तरह’’ थी, क्योंकि यह ‘‘मंत्रियों के नियंत्रण के अधीन’’ थी। उन्होंने चेतावनी दी, ‘‘अगर भारत इंग्लैंड की नकल

भानु धमीजा सीएमडी, दिव्य हिमाचल गांधी इस पर पूरी तरह स्पष्ट थे कि नई कांग्रेस और इसके सदस्य किस प्रकार देश की सेवा करेंगे। उनका प्रारूप विशिष्ट था। उन्होंने लिखा कि हर कांग्रेस कार्यकर्ता को ‘‘छुआछूत शपथपूर्वक त्यागनी होगी’’ और ‘‘अंतर-सांप्रदायिक एकता, और सभी धर्मों के लिए समान आदर व सम्मान के आदर्श में विश्वास

भानु धमीजा सीएमडी, दिव्य हिमाचल मोदी कभी राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने की सोचें, इसकी संभावना नहीं, क्योंकि इससे उनकी शक्तियों में कटौती होगी। वर्ष 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने भी समान कारण के चलते वह प्रणाली अपनाने की अपनी योजना छोड़ दी थी। कांग्रेस नेता एआर अंतुले ने यह 1994 में स्वीकार किया :

सिविल राइट्स एक्ट के बाद 50 साल के दौरान अश्वेतों ने राजनीतिक शक्ति, आर्थिक स्थिति और शिक्षा के क्षेत्रों में बहुत प्रगति की। अश्वेत वोटर टर्नआउट श्वेतों से आगे निकल गया। उनके निर्वाचित प्रतिनिधि सात गुना बढ़ गए। औसत आय 22,000 डॉलर से 40,000 डॉलर हो गई। हाई स्कूल पास करने वालों की दर 25

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने के लिए बहुत जोर लगा रहे हैं। सरकारी एजेंसियां एक मजबूत प्रधानमंत्री की सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई इच्छा पूरी करने के लिए एक-दूसरे से होड़ में हैं। परंतु लोग इस विचार के दीर्घकालिक लाभों और हानियों को न तो