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प्रतिबिम्ब


शक्ति पूजा का ‘निराला’ पथ

यदि व्यक्ति में सिंहभाव है, वह शत्रु को क्षत-विक्षत करने में हिचकता नहीं, आज के शब्दों में उसके भीतर किलिंग इंस्टिंक्ट है, कालज्ञ है, उचित समय पर वार करता है, तो माता उस व्यक्ति पर सवारी करती हैं उसके भीतर अवतरित होती हैं। इसके बाद श्रीराम प्रकृति के अंग-उपांगों में देवी की उपस्थिति की अनुभूति करते हैं…

गतांक से आगे... एक और रोचक तथ्य यह है कि जांबवान राम को एक ऐेसे समय युद्ध छोड़ने की सलाह दे रहे हैं, जब युद्ध निहायत ही निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। रघुवर के बिना सेना संचालन और युद्ध में जीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन राम इस सुझाव को स्वीकार कर लेते हैं और यही असंदिग्ध निष्ठा ही उन्हें शक्ति के समीप ले जाती है। अब मर्यादा पुरुषोत्तम शक्तिपूजा को उद्यत होते हैं। सिंह को देवी का प्रतीक मानकर सिंहभाव से देवी की उपासना का निर्णय करते हैं। जनरंजन.चरण.कमल.तल, धन्य सिंह गर्जित, यह मेरा परम प्रतीक मातः समझा इंगित मैं सिंह इसी भाव से करूंगा अभिनिंदित। शक्ति का सिंहभाव से संबंध समझने जैसा है। शक्ति सिंहारूढ़ है। सिंह की सवारी करती है और सिंहभाव में निवास करती है। शेर की सवारी बहुत ही दुष्कर और खतरे से भरा कार्य है। जो शेर की सवारी करने जैसा दुष्कर कार्य कर सकते हैं, असंभव माने जाने वाले लक्ष्यों के लिए सब कुछ दांव पर लगा देता है, वही सिंह पर सवारी कर सकता है। शेर पराक्रमी है, चतुर ह, फुर्तीला है, जो इन गुणों से युक्त है, माता उस पर सवारी करती हैं। पराक्रम भाव के बिना शक्ति का आशीर्वाद नहीं मिलता। यदि व्यक्ति में सिंहभाव है, वह शत्रु को क्षत-विक्षत करने में हिचकता नहीं। आज के शब्दों में उसके भीतर किलिंग इंस्टिंक्ट है, कालज्ञ है, उचित समय पर वार करता है, तो माता उस व्यक्ति पर सवारी करती हैं उसके भीतर अवतरित होती हैं।

इसके बाद श्रीराम प्रकृति के अंग-उपांगों में देवी की उपस्थिति की अनुभूति करते हैं। उनके लिए समुद्र से लेकर अंबर तक सब कुछ शक्ति का स्वरूप हो जाता है। वह देवी जप के पुरश्चरण के लिए 108 कमल पुष्पों की मांग करते हैं। उनके लिए कमल के पुष्प प्रकृति में उपलब्ध अर्पण करने योग्य सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। राम कहते हैं-

देखो बंधुवर, सामने स्थिर जो वह भूधर, शोभित शत हरित गुल्म तृण से श्यामल सुंदर,

पार्वती कल्पना है, इसकी मकरंद विंदु  गरजता चरण प्रांत पर हिस वह नहीं सिंधु।

दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर, अंबर में हुए दिगंबर अर्चित शशि.शेखर

चहिए हमें एक सौ आठ कपि इंदीवर एकम से कम अधिक और हों अधिक और सुंदर

जओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर, तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।

साधना प्रतिदिन गहन होती जाती है। श्रीराम की कुंडलिनी शक्ति जागृत होना प्रारंभ होती है। उनके आराधना के प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि कंपायमान हो जाती है।  लेकिन ज्यों ही शक्ति सहस्रार चक्र को बेधने वाली होती है और श्रीराम 108वां कमलपुष्प देवी को अर्पित कर आराधना का समापन करने को उद्यत होते हैं, देवी उनकी परीक्षा लेने के लिए उनके पीछे रखे 108वें पुष्प को हंसकर उठा ले जाती हैं। श्रीराम नीलकमल का अंतिम पुष्प अर्पित करने के लिए हाथ बढ़ाते हैं और वहां पर कुछ न पाकर साधना में स्थिर हो चुका उनका मन यकायक चलायमान हो उठता है। आशंकाएं उनको घेरने लगती हैं।

वह अपने जीवन का धिक्कारते हैं। धिक धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध, लेकिन राम तो मर्यादा के लिए सतत संघर्ष के प्रतीक हैं। वह तुरंत ही स्वयं को संभालते हैं और 108वें नीलकमल की जगह अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करने का निर्णय लेते हैं। इस निश्चय के साथ ही उनकी शक्ति आराधना अपने शीर्षतम बिंदु को स्पर्श करती है और उनके व्यक्तित्व का उज्ज्वलतम पक्ष भी हमारे सामने आता है.

यह है उपाय कह उठे राम ज्यों मंद्रित घन कहती थीं, माता मुझे सदा राजीवनयन।

दो नील कमल है शेष अभी, यह पुरश्चरणए पूरा करता हूं देकर मातः एक नयन।

कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर, रहा झलक ले लिया हस्त लकदक करता वह महाफलक।

ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन ले अर्पित करने को उद्यत हो गए सुमन

जिस क्षण बंध गया बेधने को दृढ निश्चय, कांपा ब्रह्मांड हुआ देवी का त्वरित उदय.

साधु-साधु साधक धीर, धर्म धन धन्य राम! कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।

नील कमल के गायब होते ही मर्यादा पुरुषोत्तम को स्मरण हो आता है बचपन में उनकी माता उनके सुंदर और विशाल नेत्रों के कारण उन्हें कमलनयन के नाम पुकारती थीं। अब उन्होंने कमल के पुष्प की जगह पर अपनी कमल जैसी आंखें भगवती को अर्पित करने का निर्णय लिया, अपने शरीर के इस सर्वाधिक सुंदर अंग को देवी को अर्पित करने का निश्चय किया। वह ज्योंहि ही बाण से अपनी दाहिनी आंख को भगवती को समर्पित करने का प्रयास करते हैं, भगवती स्वयं प्रकट होकर उनके हाथ को पकड़ लेती हैं। वह उनके धर्म की प्रति निष्ठा की प्रशंसा करती हैं। यहां पर निराला का मन्तव्य स्पष्ट है कि साधना व्यक्तित्व के सर्वश्रेष्ठ अंश का समर्पण मांगती है। भगवती आसक्तियों और आकांक्षाओं का बलिदान मांगती है। यदि व्यक्ति अपनी प्रतिभा, क्षमता, उत्कृष्टता का समर्पण देवी के चरणों में करता है तो उसे वह वरदान मिलता ही है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम को मिला।

April 17th, 2016

 
 

चाह

मुझे मिले, दुनिया की दौलत, ऐसी मुझको चाह नहीं। मालिक बनूं, बड़े महलों का, इसकी भी परवाह नहीं। मुझको देना, इतना प्रभु जी, मेरा यह संसार पले। अतिथि न जाए, भूखा घर से, सुख-शांति का दीप जले। नहीं चाहिए इतना पैसा, जिससे अवगुण जागृत हों। […] विस्तृत....

April 17th, 2016

 

शक्ति पूजा का ‘निराला पथ’

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April 10th, 2016

 

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April 10th, 2016

 

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April 10th, 2016

 

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April 10th, 2016

 

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April 10th, 2016

 

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April 10th, 2016

 

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April 3rd, 2016

 

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April 3rd, 2016

 
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