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प्रतिबिम्ब


विमर्श का केंद्र बने बाल साहित्य

 ‘बड़ों’ के लिए लिखने वाले कितने ही साहित्यकारों ने समृद्ध बाल साहित्य की रचना भी की है, जिनमें विष्णु प्रभाकर, जय प्रकाश भारती, राष्ट्रवंधु, हरिकृष्ण देवसरे, क्षमा शर्मा, दामोदर अग्रवाल, शेरजंग और दिविध रमेश आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके साथ ही कविता के क्षेत्र में भी जो अनूठे प्रयास हुए हैं, उसे ध्यान में रखते हुए स्व. जय प्रकाश भारती जी ने इस समय को ‘बाल साहित्य’ का ‘स्वर्णिम युग’ कहा है। जहां तक बच्चों की पहली पुस्तक के प्रकाशित होने का प्रश्न है, तो सन् 1623 ई. में ‘जटमल’ द्वारा लिखित ‘गोरा-बादल की कथा’ को पहली बाल केंद्रित पुस्तक माना जाता है…

बाल मन पर बाल साहित्य का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है, लेकिन बच्चों के लिए… बच्चों जैसा लिख पाना कोई आसान काम तो है नहीं। बच्चों की गुदगुदी मुस्कान का असर हर उम्र के व्यक्ति पर पड़ता ही है। बच्चों की मीठी मुस्कान तो दुखी और कठिन समय में भी हमारे जीवन में मधुरता के रंग भर देती है। अनायास ही हमारे…हम सभी के जीवन में, घर-परिवार में बच्चों की किलकारियां, इनकी हंसी-ठिठोली  घर को स्वर्ग बना देती है। बालकों की खुशी के क्षणों को हम सभी ने महसूस किया ही है।

परंतु इस मुस्कान को बच्चों के चेहरे पर लाना कोई आसान काम नहीं है। कविता, कहानी, नाटक और गीतों द्वारा बालकों को खुश रख पाना या फिर उनके बल मन पर कोई विशिष्ट प्रभाव डाल देना बहुत मुश्किल काम है। रोते हुए बच्चे को हंसाना, जिद्द करते हुए बच्चे के ध्यान को किसी अन्य दिशा में परिवर्तित करना अपने आप मे एक विचित्र… एक अद्भुत कला है। जो हर इनसान में नहीं होती। बच्चों के मनोविज्ञान को समझना,   बालमन में उठने वाली भावनाओं को पकड़ना एक  बड़ी उपलब्धि है।

बच्चा क्यों, कैसे, कब और कहां हंसता है… बाल साहित्यकार यदि यह समझ लें… जान लें तो वे निश्चय ही वह साहित्य की बुलंदियां छू सकते हैं। बाल मन की समझ के कुछ अच्छे उदाहरण टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले इक्का-दुक्का विज्ञापनों में दिख जाते हैं। ये मात्र 5-7 सेकंडों के ही या कहें कि कुछ लम्हों के ही होते हैं, लेकिन फिर भी ‘कारगर’ होते नजर आते हैं।

जैसे ‘सुनते नहीं हो’ आदि की ‘स्क्रिप्ट’ (आलेख) कुछ लम्हों की ही होकर भी बहुत कुछ कहने में सामर्थ्य रखती है। यह पंक्तियां बस रोमांचित और उत्साहित करते हुए,  एक अनोखी सी गुदगुदी देते हुए गुजर जाती हैं। उस समय टेलीवीजन पर इन विज्ञापनों को देखते बच्चों को या यह कहें कि ‘बाल मन’ की क्या दशा होती है… वह बस देखते ही बनती है। बच्चे ऐसे विज्ञापनों में स्वयं की भूमिका को महसूस करते हुए अनुभव करते हैं। और स्वयं ही मुस्कुराते देखे जा सकते हैं। विज्ञापन ‘सुनते नहीं होऽऽऽऽ’ में तो  बच्चे अकसर खिलखिलाते हुए नजर आते हैं। इस विज्ञापन में बच्चे के मनोभाव यह दर्शाते हैं कि वे भी अपने से बड़ों को ‘अच्छी सलाह’ दे सकते हैं। इसी एक ‘संवाद’ के चलते बच्चे स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

क्या कहें… बस कमाल की ‘स्क्रिप्ट’ है यह। बाल मन से इस कद्र जुड़ जाना उस ‘स्क्रिप्ट राइटर’  सफलता की निशानी है, जिसने इसे लिखा है। बच्चे भले ही इन विज्ञापनों से कुछ अधिक न सीख पाएं, लेकिन उनका ‘बालमन’ इन्हें देखने को लालायित रहता है, उत्साहित रहता है, प्रतीक्षारत रहता है। ऐसा हम सभी का व्यक्तिगत अनुभव है और मैं समझता हूं यह भी एक तरह का ‘बाल साहित्य’ है, जो बस बंद लम्हों, कुछ क्षणों में बस कुछ पंक्तियों में ही ‘अपना काम’… अपना प्रभाव…. अपना असर छोड़ जाता है।

इस तरह का साहित्य रचना कुछ गिने-चुने लोगों के बूते की बात रही है। ‘बाल साहित्य’ की अन्य विधाओं में जैसे कविता, कहानी, निबंध, नाटक और जीवनी आदि के क्षेत्र में कुछ नहीं हो रहा हो ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि बाल नाटकों की एक अच्छी पुस्तक ‘उमंग’ हाल ही में सुप्रसिद्ध कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी से संपादन में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।  जानकर लोग यह भी जानते हैं कि भले ही हिंदी में बाल साहित्यकारों की संख्या ‘न’ के बराबर रही हो, लेकिन ‘बड़ों’ के लिए लिखने वाले कितने ही साहित्यकारों ने समृद्ध बाल साहित्य की रचना भी की है, जिनमें विष्णु प्रभाकर, जय प्रकाश भारती, राष्ट्रवंधु, हरिकृष्ण देवसरे, क्षमा शर्मा, दामोदर अग्रवाल, शेरजंग और दिविध रमेश आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके साथ ही कविता के क्षेत्र में भी जो अनूठे प्रयास हुए हैं, उसे ध्यान में रखते हुए स्व. जय प्रकाश भारती जी ने इस समय को ‘बाल साहित्य’ का ‘स्वर्णिम युग’ कहा है। जहां तक बच्चों की पहली पुस्तक के प्रकाशित होने का प्रश्न है, तो सन् 1623 ई. में ‘जटमल’ द्वारा लिखित  ‘गोरा-बादल की कथा’ को पहली बाल केंद्रित पुस्तक माना जाता है।

बाल कविता के क्षेत्र मे श्रीधर पाठक, विद्या भूषण ‘विभु’, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, सोहन लाल द्विवेदी आदि बहुत सारे रचनाकारों की रचनाएं अमर हैं। स्वाधीन भारत में भले बाल साहित्य को बहुत महत्त्व न दिया गया हो, किंतु रचनाओं की दृष्टि से  निःसंदेह यह युग ‘स्वर्ण युग’ ही कहा जाएगा। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीप्रसाद, दामोदर अग्रवाल, बालकृष्ण गर्ग, रमेश तैलंग, कृष्ण शलभ, श्याम सिंह ‘शशि’, भवानी प्रशाद मिश्र और प्रभाकर ‘आमचे’ जैसे कवियों ने भी बाल साहित्य में अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज करायी है।

1947 में 1970 तक के समय की हिंदी  ‘बाल कविता के शिखरों का’ ‘गौरव युग’ माना जाता है।  प्रकाश मनु के शब्दों में इस युग को ‘गौरव युग’ कहने का अर्थ है कि यह युग ‘बाल कविता’ में ऊर्जावान और काव्य क्षमता की संभावना से पूर्ण, नए युग की चेतना को अपने दामन में समेटे हुए प्रतीत होती है। वह न तो इस समय से पहले ही थी, और न ही फिर इस समय के बाद कहीं नजर आई हो… कहा नहीं जा सकता। यहां दामोदर अग्रवाल की शिकायत भरी कुछ पंक्तियां बच्चों के लिए प्रस्तुत हैं-‘बड़े शरम की बात है बिजली, बड़े शरम की बात।

जब देखो गुल हो जाती हो, ओढ़ के कंबल सो जाती हो।

नहीं देखती हो, यह दिन है, या है काली रात  बिजली, बड़े शरम की बात॥’

और शेरजंग की कविता के यह अंश कि-

कितनी अच्छी, कितनी प्यारी, सब पशुओं से न्यारी गाय,

सारा दूध हमें है देती, आओ इसे पिला दें चाय॥

बच्चों के बाल मन की कल्पना को पंख देती  और हल्की-हल्की गुदगुदी देतीं। ये केवल दो-दो पंक्तियों की क्षणिकाएं कितना आनंद देती हैं। यह केवल बाल मन ही समझ सकता है। यहां मुझे अपनी लिखी कविता ‘बच्चे’ की कुछ लाइनें बरबस ही याद आती है, जो हिमाचल प्रदेश की प्राथमिक कक्षाओं में ‘एक स्तर’ के बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तक में रखी गई है…कुछ इस प्रकार है-

बड़े निराले मेरे बच्चे, भोले-भाले मेरे बच्चे।

सूरज जैसे दिखते मुझको, गोरे-काले मेरे बच्चे॥

अपनेपन का भाव लिए यह कविता आज भी बच्चों में लोकप्रिय तो है ही। मेरे शिक्षक भाइयों की भी पसंद है।

छोटी कक्षाओं में हमारे समय में बिलकुल छोटी-छोटी सहज और सरल भाषा में लिखी कविताएं, जब हमने पढ़ी और सुनीं… यकीन ही नहीं होता कि वे रचनाएं हमें अभी तक भी कंठस्थ हैं। बस ऐसा ही ‘बाल साहित्य’ बच्चों के लिए ‘परोसने’ की आवश्यकता है, जिसे बच्चे सरलता से  पढ़ तो सकें ही ‘कंठस्थ’ भी कर पाएं। सन् 1970 के बाद के इसी दौर में ‘बाल कविता’ में बहुत सारे और भी नाम दिखाई पड़े, विशेषकर युवा लेखकों की हिस्सेदारी काफी बढ़ी नजर आती है। जिनमें तीन-चार पीढि़यों के ‘बाल साहित्य’ के कवि एक साथ खड़े दिखाई देते हैं। रमेश तैलंग, दिविक रमेश और जय प्रकाश भारती जी की ये बाल रचनाएं ‘अले-सुबह हो गई… आंदन बुहाल लूं, कपले ये धूल छने हैं,…. इन्हें संभाल लूं’ (अरे सुबह हो गई… आंगन बुहार लूं… कपड़े ये धूल सने हैं… उन्हें संभाल लूं) और यह भी कि ‘एक था राजा… एक थी रानी, दोनों करते थे मनमानी।’

राजा का तो पेट बड़ा था, रानी का भी पेट

घड़ा था। ‘आदि कविताएं अनायास ही बाल मन

को अपनी ओर आकर्षित करने में बेहद सफल रहीं। हमारे घरों की अंगनाइयों में भी अकसर बच्चों को ऐसी ही पंक्तियां बोलते सुना करते हैं जैसे

कि ‘एक था राजा एक थी रानी…दोनों मर गए खत्म कहानी’।

— राजेंद्र ‘पालमपुरी’ मनाली,  कुल्लू

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