Divya Himachal Logo Feb 24th, 2017

विचार


‘गरीब-हितैषी’ मोदी का बजट

संसद का बजट सत्र 30 जनवरी से शुरू हो रहा है। पहले दिन आर्थिक समीक्षा को पेश करने के बाद पहली फरवरी को बजट प्रस्ताव सार्वजनिक किए जाएंगे। 2017-18 का बजट कैसा होगा, फोकस क्या रहेगा, लोकलुभावन घोषणाएं होंगी या नहीं, देश का वित्तीय घाटा कितना होगा, इन तमाम पहलुओं का सच बजट पेश करने के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन पीएमओ, वित्त मंत्रालय और अन्य सूत्रों से जो संकेत मिले हैं, उनके मुताबिक बजट में गरीबों और आम आदमी पर ही फोकस रहेगा। पीएमओ ने बीते साल की तरह इस बार भी जनता की राय, अपेक्षाएं और प्राथमिकताएं जानने के लिए प्रस्ताव मांगे थे। उसके तहत करीब 15,000 प्रस्ताव पीएमओ की वेबसाइट पर आए हैं। उनमें यूनिवर्सल बेसिक इन्कम के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, असंगठित क्षेत्र में स्थायित्व आदि के मुद्दे अहम रहे हैं। चूंकि 2016-17 का बजट किसान और कृषि पर केंद्रित था, लिहाजा इस बार का बजट आम आदमी और गरीबों को संबोधित कर सकता है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी नोटबंदी के दौर के बाद अब खुद को ‘गरीब हितैषी’ साबित करना चाहते हैं। नोटबंदी के दौरान और उसके तत्काल बाद, खासकर असंगठित क्षेत्र में, करीब 15 करोड़ लोग बेकाम और बेकार हुए हैं। ये सरकारी संस्थाओं के ही आंकड़े हैं। सिर्फ यही नहीं, पूरे देश में बेरोजगारों की संख्या भी छह करोड़ से ज्यादा है। करीब 30 करोड़ आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीने को अभिशप्त है। करीब 40 करोड़ लोग अनपढ़ हैं। भारत का यह यथार्थ भी मोदी सरकार को कांग्रेसी विरासत में मिला है, लेकिन अब चुनौती प्रधानमंत्री मोदी के लिए ही है। दरअसल सरकार हर साल दो करोड़ रोजगार मुहैया कराने में कामयाब नहीं हो पाई है। एनडीए की मौजूदा सरकार के दौरान 5.56 लाख रोजगार का ही सृजन हो पाया है। राष्ट्रीय कौशल विकास कारपोरेशन के आंकड़े बताते हैं कि प्रशिक्षित 92 लाख में से करीब 35 लाख को ही नौकरी मिल पाई है। ऐसे में बजट में रोजगारपरक फैसलों की घोषणा की जानी चाहिए। दरअसल देश के गरीबों या औसत आदमी को आयकर सीमा या सस्ती-महंगी होने वाली वस्तुओं से इतना सरोकार नहीं है। देश के सिर्फ 3.3 फीसदी नागरिक ही आयकर अदा करते हैं। गरीब की बुनियादी चिंता यह है कि उसकी आमदनी किस तरह स्थिर और बेहतर हो। उसके लिए बजट में असंगठित क्षेत्र के लिए कड़े कानून का प्रावधान होना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिहाज से भी भारत की जीडीपी का दो-तीन फीसदी ही खर्च किया जाता है। नतीजतन गरीब तो पढ़ने में ही विवशता महसूस करता है। आम आदमी के लिए भी प्राथमिक और उच्च शिक्षा बेहद महंगी है। बेशक बैंक शिक्षा के लिए कर्ज देते हैं, लेकिन उनकी ब्याज दर बेहद बोझिल साबित होती है। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया है और स्वास्थ्य संबंधी भी कुछ योजनाएं जारी हैं, लेकिन सरकारी आंकड़े ही खुलासा करते हैं कि भारत में करीब 10 लाख महिलाएं शिशु को जन्म देने के थोड़े अंतराल के बाद ही मर जाती हैं और 1.5 लाख से ज्यादा बच्चे भी हैं, जो जन्म के बाद लंबे समय तक जिंदा नहीं रह सकते। अन्य खतरनाक बीमारियों के आंकड़े अलग हैं। क्या देश के नागरिकों को यूं ही मरता देखा जा सकता है? लिहाजा मोदी सरकार से अपेक्षाएं हैं कि उनके बजट में सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य बीमा संबंधी ‘अनिवार्य प्रावधान’ जोड़ने की शुरुआत की जाएगी। संकेत ऐसे हैं कि यदि आयकर की सीमा 2.5 लाख से बढ़ा कर 3.5 या चार लाख रुपए की जाती है, तो पांच से दस लाख रुपए की सालाना आमदनी वालों की खूब बचत हो सकेगी। हालांकि इस आमदनी के दायरे में आम आदमी या गरीब नहीं आते, लेकिन असंख्य पेंशनभोगी जरूर आते हैं। बजट में आम पेंशनभोगी जमात के लिए कुछ राहतें भी होनी चाहिए। अपेक्षाएं हैं कि बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल, यात्रा आदि पर कटौती या छूट के कुछ नए प्रावधान किए जाने चाहिए। वैसे सरकार का फोकस यह रहेगा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गरीबों पर ज्यादातर योजनाओं की राशि खर्च की जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने बजट प्रस्तावों को अंतिम रूप देने के मद्देनजर कुल 10 बैठकें की हैं। प्रमुख सचिवों से अलग-अलग मुलाकातें कीं और बजट प्रारूप पर विमर्श किया। सूत्रों का यह मानना है कि जनता से जो प्रस्ताव पीएमओ को मिले थे, उनके आधार पर कमोबेश पांच योजनाएं तय की जा सकती हैं। सुकून की बात यह है कि फिलहाल बाजार की स्थिति बेहतर है। प्रमुख दालें 100 रुपए किलो से कम भाव पर बिक रही हैं। फल और सब्जियों के दाम भी सस्ते हैं, लेकिन आम आदमी और खासकर गरीब की अपेक्षा यह रहेगी कि ये दाम और भाव अब स्थिर ही रहने चाहिए। उनमें अचानक उछाल नहीं आना चाहिए। सरकार इस बाबत भी कुछ प्रावधान करेगी। दरअसल मोदी सरकार के लिए यह सुनहरा मौका है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा या औसत आदमी के जीवन-भत्ते को जीडीपी से जोड़े और कमोबेश चार फीसदी तो तय करे। वादे तो छह फीसदी तक के किए जाते रहे हैं। मोदी सरकार ने वित्तीय घाटा 3.5 से घटा कर 3.3 फीसदी रखने के संकेत दिए हैं। यदि ऐसा हो जाता है, तो सरकार अपने सामाजिक, सामुदायिक दायित्व निभाने में कामयाब हो सकती है।

 

January 30th, 2017

 
 

चुनावी मौसम

(डा. सत्येंद्र शर्मा, चिंबलहार, पालमपुर) अति निर्धन, अति दीन हैं, फटी हुई है जेब, रोटी त्यागी, खा रहे, काजू-किशमिश, सेब। हाथी टिकटें बांटता, मांगे पांच करोड़, लेनी है तो बात कर, क्यों पड़ रही मरोड़। सर्दी से नस-नस जमी, गर्मी सा एहसास, टर्र-टर्र करने लगे […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

भारत का बढ़ता वर्चस्व

(अर्पित ठाकुर, बिझड़ी, हमीरपुर) गणतंत्र दिवस की परेड में दुनिया को अपनी बढ़ती ताकत का परिचय देने के पश्चात अमरीकी विदेश नीति से जुड़ी एक पत्रिका ने भारत के वैश्विक समुदाय में बढ़ते प्रभाव की तसदीक की है। ‘दि अमेरिकन इंटरेस्ट’ नाम की इस पत्रिका […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

विनोद-परिहास के आदिम प्रसंग

‘कुमारसंभव’ में कालिदास ने अपने आराध्य शिव को ही हास्य का आलंबन बनाया है। ब्रह्मचारी बटु शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या करने वाली पार्वती का मजाक उड़ाते हुए कहता है-हे पार्वती! जरा सोचो तो कि गजराज पर बैठने योग्य तुम जब […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

स्कूली बस हादसे

(देव गुलेरिया, योल कैंप, धर्मशाला) कानपुर में हुए स्कूल बस हादसे का दृश्य इतना दर्दनाक कि कोई भी इनसान उसे देखकर दहल जाए। उन स्कूली नन्हे नौनिहालों के बिखरे स्कूली बैग-किताबें सड़क पर हमारी स्कूली व्यवस्था को दर्शा रहे थे। रोते-बिलखते वे मां-बाप अपने उन […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय  की गणना हिंदी साहित्य के उन कवियों में की जाती है, जिनकी भाषा और शिल्प में पत्रकारिता का प्रभाव होता था और उनकी रचनाओं में आम आदमी की व्यथा झलकती थी। रघुवीर सहाय एक प्रभावशाली कवि होने के साथ – साथ कथाकार, निबंध […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

हिमाचली लोक जीवन में कुलज माता

विवाह उत्सव में एक नहीं बार-बार इनकी पूजा करनी पड़ती है। कुलज की स्थापना कृषक-श्रमिक परिवारों में विभिन्न रूपों में होती है। कहीं पिंडियों के रूप में तो कहीं देहरी अथवा मढ़ी के रूप में तो कहीं दाड़ू की टहनी के रूप में इनकी उपस्थिति […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

कविताएं

‘तुम्हारे यूं चले जाने से’ तुम्हारे यूं ही चले जाने से न जाने कितनी बातें होंगी न जाने कितने सपने टूटे होंगे उन गरीब, असहाय लोगों के जिनके लिए तुम एक बैंक अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि एक मसीहा थे। तुम्हारे यूं ही चले जाने […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

लोकगाथाओं में सतलुज के राग

किन्नौर में एक रोचक लोककथा है कि शोणितपुर (सराहन) के राजा बाणासुर ने मानसरोवर से सतलुज को सराहन तक अपना अनुगमन करने का आदेश दिया। सराहन पहुंचकर बाणासुर ने नदी को आगे का मार्ग स्वयं ढूंढ निकालने का आदेश दिया और स्वयं वहीं राज्य स्थापित […] विस्तृत....

January 30th, 2017

 

राजधानी के अक्‍स में दूसरी राजधानी

यह अचानक है या एक लंबी परिपाटी का मुकाम कि मुख्यमंत्री ने दूसरी राजधानी का तमगा भी कांगड़ा जिला मुख्यालय को पहना दिया। हालांकि जिस तरह सरकार की व्यस्तता इस ओर निरंतर बढ़ रही थी और शीतकालीन प्रवास से शीतकालीन सत्र, सियासी अनिवार्यता बन गए, […] विस्तृत....

January 29th, 2017

 
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