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विचार


अनुपम मिश्र

अनुपम मिश्र  प्रसिद्ध पर्यावरणविद, लेखक, संपादक और छायाकार थे। गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। वह इस प्रतिष्ठान की पत्रिका ‘गांधी मार्ग’ के संस्थापक और संपादक थे।  वह राजेंद्र सिंह की संस्था तरुण भारत संघ के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे, उनकी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ ब्रेल लिपि सहित तेरह भाषाओं में प्रकाशित हुई । भारत में पर्यावरणीय चेतना जागृत करने में यह पुस्तक एक मील का पत्थर साबित हुई …

December 26th, 2016

 
 

बैंकों पर बढ़े नियंत्रण

(किशन सिंह गतवाल, सतौन, सिरमौर) देश में नोटबंदी के बाद कई तिकड़मों के बाद नोटों से काले धन कुबेरों की तिजोरियां फिर से भर गईं, जिसके कारण आम लोगों को अपनी दैनिक जरूरतें पूरा करना भी कठिन हो गया है। हैरानी तब होती है, जब […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

कहां खो गई वो चीख

(डा. सत्येंद्र शर्मा, चिंबलहार, पालमपुर) हाथ जोड़ती, कांपती, मांग रही थी भीख, कहां गई वो निर्भया, कहां खो गई चीख। चिंगारी वह क्रांति की, क्यों कर बुझ गई आज क्या बदली है सोच कुछ, क्या वो आए बाज? कहां अश्रु वे बह गए, किसको है […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

पानी की अनुपम कहानी

शोध चाहे वह किसी भी तरह का हो, यदि वह लोक और उसकी भाषा से नहीं जुड़ता, तो तथ्य और अंतःदृष्टि दोनों के स्तर पर ही निष्प्राण ही रहता है।  बाद में कार्यक्रमों अथवा गांधी शांति प्रतिष्ठान में ही उनसे कई बार मिलना हुआ। उनसे […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

भाषा और पर्यावरण

अनुपम मिश्र समय-समय पर प्रतिबिंब में भी प्रकाशित होते रहे। उनकी पहचान तो पर्यावरविद के रूप में होती है लेकिन भाषा और व्यवस्था की भी उनकी एक साफ समझ थी। सभी विकृतियों को छूते हुए भी उनकी भाषा साफ बनी रहती, सहजता से प्रवाहित होती […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

चिंताजनक बदलाव

(रूप सिंह नेगी, सोलन) देश तो सदियों से बदलता आ रहा है। समय के अनुसार लोगों और लोक परंपराओं का बदलना स्वाभाविक ही है। जिन सुविधाओं का हम आज इस्तेमाल कर रहे हैं, वे आसमान से तो टपकी नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों की कड़ी मेहनत […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

कविताएं

लाल गुलाबी खुश हैं लेकिन गम के मारे हरे-हरे हैं नोटों की अदला-बदली से स्वयं नोट भी डरे-डरे हैं नहीं अभी तक पता किसी को खोटे कौन व कौन खरे हैं, एक हाथ से वे जाते हैं और दूसरे से आते आपस में बतिया नहीं […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

वाद्य यंत्रों से संरक्षित रह पाएगा हिमाचली संगीत

यही नहीं, कुल्लू दशहरा के ‘प्राइड ऑफ  कुल्लू’ कार्यक्रम जिसमें हजारों औरतें एक साथ नृत्य करती हैं, उसमें सौ फीसदी हिमाचली लोक वाद्य यंत्र ही बजाए जाते हैं। राठी भी मानते है वर्तमान में लोक वाद्य यंत्र अधिकतर देव कार्यों में ही बजाए जाते है… […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

संभावना में बदले कचरे की समस्या

संभावना में बदले कचरे की समस्याकुलभूषण उपमन्यु (लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं) एक ओर प्लास्टिक के नुकसान सामने आ रहे हैं, तो दूसरी ओर प्लास्टिक का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है। नए से नए क्षेत्रों में प्लास्टिक का प्रयोग होने लगा है। कचरा प्रबंधन को समस्या के […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 

विपक्षी बिखराव चुनौती नहीं

मंगलवार 27 दिसंबर को दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक है। प्रधानमंत्री मोदी और नोटबंदी के खिलाफ लामबंदी की एक और कोशिश…! दूसरी ओर 2017 का सूरज उगता महसूस हो रहा है। नई उमंगों, नई खुशियों, नए लक्ष्यों और नए प्रयासों का नया साल…! वर्ष […] विस्तृत....

December 26th, 2016

 
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