Divya Himachal Logo Mar 27th, 2017

विचार


अनुपम मिश्र

अनुपम मिश्र को पर्यावरणविद के रूप में ही प्रसिद्धि मिली, लेकिन ‘आज भी खरे हैं तालाब’, ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ और ‘साफ माथे का समाज’ जैसी पुस्तकें उन्हें उत्कृष्ट साहित्यकार और चिंतक के रूप में भी स्थापित करती हैं। वह लोक जीवन और लोक ज्ञान के साधक रहे। उनका मानना था कि पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान सामुदायिक स्तर पर ही संभव है। साल 1996 में उन्हें इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया गया…

March 6th, 2017

 
 

संघर्षों से उपजता है देर तक जिंदा रहने वाला साहित्य

सुरेश सेन निशांत हमेशा जन के लिए लिखा जाता है और ऐसा साहित्य संघर्षों से उपजता है। इसलिए ऐसे साहित्य को किसी प्रोमोशन की जरूरत नहीं। भला कबीर का साहित्य किसी अकादमी विभाग या संस्था के कारण जिंदा रहा …? कदापि नहीं। वह जिंदा रहा […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

जरूरी है साहित्य-संस्कृति और समाज के अंतर्संबंधों की पड़ताल

मुरारी शर्मा अतिथि संपादक सही नब्ज पकड़ना, भले ही वह व्यक्ति की हो अथवा समाज की, भारत में विशेषज्ञता का एक पैमाना रहा है। एक वैद्य सही नब्ज पकड़ ले तो रोगी का स्वस्थ होना तय है। ठीक इसी तरह समाज की सही नब्ज पकड़ते […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

मतभेदों से बचाएं राष्ट्रीयता

मतभेदों से बचाएं राष्ट्रीयताकुलदीप नैयर लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं हम लंबे वक्त से आपस में मिल-जुलकर रहते आए हैं। हालांकि हिंदुत्व के प्रभाव के बावजूद भारत के लोग इस बात को शिद्दत के साथ महसूस करने लगे हैं कि उन्हें सब मतभेद भुलाकर एक होकर रहना होगा, जैसा […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

समकालीन साहित्य से वास्ता रखने वाले शिक्षक साहित्य में कम ही हैं

निरंजन देव साहित्य के अध्ययन-अध्यापन तथा साहित्य से पाठक की दूरी जैसे सवाल तब और भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, जब हम उन्हें साहित्य शिक्षण की शीर्ष संस्था हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से जोड़ कर देखते हैं । पाठ्यक्रम में हिंदी साहित्य से हमारा पहला परिचय […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

सृजन और शोध के नाम पर पिछड़ रहे हैं विश्वविद्यालय

डा. विजय विशाल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थान साहित्य सृजन या साहित्यिक माहौल बनाने में क्या भूमिका निभा रहे हैं? सीधे-सीधे इस प्रश्न का उत्तर न देकर मैं इस बारे में अपनी टिप्पणी कुछ उक्तियों से शुरू कर रहा हूं- ‘कबीरदास ने काशी विश्वविद्यालय […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

छपे हुए शब्द की सत्ता सदैव रहेगी…

दीनू कश्यप साहित्य कभी भी राज्यों के नाम पर नहीं होता है। साहित्य तो सीधे -सीधे भाषाओं, बोलियों और उप-बोलियों की धाराओं से जन्म लेता है। भाषा भी सामूहिक समाजों के भीतर से सृजित होती है। अगर माना जाए तो साहित्यकार एक आईना बनाने वाला […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

युवा जरूरतों को भी समझे बजट

युवा जरूरतों को भी समझे बजट( अनुज कुमार आचार्य लेखक, बैजनाथ से हैं ) बड़ी तेजी से विकसित हो रहे हमारे कस्बों, शहरों में छोटे उद्यमियों को लघु उद्योग लगाने हेतु प्रोत्साहित किया जाए, ताकि वे अपने यहां पांच-दस बेरोजगार युवाओं को रोजगार प्रदान कर सकें। इसके लिए इन उद्यमियों […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

घृणा अपराध की लपटें

( स्वास्तिक ठाकुर, पांगी, चंबा ) अमरीका में भारतीयों के खिलाफ ‘हेट क्राइम’ के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। एक ऐसे दौर में जबकि भारत-अमरीका आपसी संबंधों को एक नए शिखर पर ले जाने को उत्सुक हैं, ये हमले चिंतनीय ही माने जाएंगे। […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 

हवाई दैत्य का कहर

( अक्षित, आदित्य, तिलक राज गुप्ता, रादौर, हरियाणा ) अमरीका की एक संस्था हैल्थ इफेक्ट इंस्टीच्यूट की भारत में वायु प्रदूषण की स्थिति पर जारी हुई रिपोर्ट दो संदर्भों में चौकाने वाली है। पहला यह कि हमारी वायु में घातक पार्टिकुलेट मैटर 2.5 कणों की […] विस्तृत....

March 6th, 2017

 
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