Divya Himachal Logo Aug 24th, 2017

विचार


स्कूली खेलों को चाहिए धन व सुविधाएं

भूपिंदर सिंह

लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं

भूपिंदर सिंहसभी कक्षाओं के लिए ड्रिल का एक-एक पीरियड रखना पड़ेगा और कक्षा के सभी विद्यार्थियों को अपनी-अपनी शारीरिक क्रियाओं के लिए जहां माकूल जगह चाहिए, वहीं उपकरण तथा विभिन्न खेलों में भागीदारी पर वह खेल सामान भी चाहिए। इस सबके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता स्कूली स्तर पर चाहिए…

प्रदेश में खेलों का स्तर किसी से छिपा नहीं है। इसका इतना पिछड़ने का मुख्य कारण खेल नर्सरी समझे जाने वाले स्कूली खेलों के लिए प्रशिक्षण सुविधा और खेल प्रतियोगिताओं के लिए धन का अभाव ही है। उच्च तथा वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर सरकार खेल सामान व खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए कहीं भी धन नहीं देती है। हां, सभी विद्यार्थियों से इकट्ठा किए गए खेल शुल्क से ही जैसे-तैसे ये सभी काम पूरे किए जाते हैं। इस दौरान कई स्तरों पर खामियां रह जाती हैं। प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय जरूर पांचवीं तथा आठवीं तक के स्कूलों की खेल प्रतियोगिताओं के लिए धन का प्रावधान करता है। उच्च तथा वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में इकट्ठा किए गए खेल शुल्क का कुछ हिस्सा स्कूल अपने पास रखता है और शेष को उपनिदेशालय को दे देता है। इसी धन से प्रतियोगिताओं के लिए यात्रा भत्ता तथा दैनिक खुराक भत्ता दिया जाता है और खेल का साजो सामान भी इसी से खरीदना होता है। पिछले कुछ वर्षों से जहां भी स्कूली खेल प्रतियोगिता हो रही है, उनकी मैस को सुचारू रूप से चलाने के लिए धन अधिकतर दानी सज्जनों के सहयोग से ही पूरा हो रहा है। तीन समय का खाना बनाने के लिए तीन दिन की प्रतियोगिता के लिए जो धन शिक्षा विभाग ने शुल्क से रखा होता है, वह एक दिन के लिए भी पूरा नहीं होता। आजकल जो स्तरीय खेल उपकरण उपयोग में लाए जाते हैं, वे बहुत महंगे होते हैं और उनकी खरीददारी को भी धन चाहिए होता है। हिमाचल प्रदेश के खेल मैदान भी अधिकतर पहाड़ी काट कर बनाए गए हैं। इन पर कभी ल्हासा गिरना तथा कभी किनारे टूटना आम बात होती। इस सबकी मरम्मत के लिए धन की जरूरत पड़ती है, मगर जब खेल के लिए फंड ही नहीं होगा तो फिर क्या किया जा सकता है।

स्कूली स्तर पर खेलों के साथ हर विद्यार्थी की फिटनेस भी जब स्कूल यानी राज्य की जिम्मेदारी हो, तो इस स्तर पर जब स्कूल में गतिविधियां चलानी होंगी तो बहुत अधिक धन की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि सभी कक्षाओं के लिए ड्रिल का एक-एक पीरियड रखना पड़ेगा और कक्षा के सभी विद्यार्थियों को अपनी-अपनी शारीरिक क्रियाओं के लिए जहां माकूल जगह चाहिए, वहीं उपकरण तथा विभिन्न खेलों में भागीदारी पर वह खेल सामान भी चाहिए। इस सबके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता स्कूली स्तर पर चाहिए। इस सबसे जहां देश को फिट नागरिक मिलेंगे, वहीं पर भविष्य के अच्छे विजेता खिलाड़ी भी मिलेंगे। स्कूली स्तर पर केवल एक शारीरिक शिक्षक पूरे शिक्षा संस्थान के लिए नियुक्त है। निकट भविष्य में ज्यादा शारीरिक शिक्षक नियुक्त करने की मंशा भी सरकार नहीं रखती है। ऐसे में अन्य विषयों के शिक्षक जो अपने विद्यार्थी जीवन में जिस खेल के खिलाड़ी रहे हैं, उस खेल को स्कूल में बढ़ावा देने के लिए सहयोग दें, जबकि राज्य में अधिकतर अन्य विषयों के अध्यापकों को खिलाड़ी विद्यार्थियों को प्रताडि़त करते ही देखा गया है। स्कूल में प्रधानाचार्य को खेल व अन्य युवा गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए सहयोग करना चाहिए। राज्य में स्कूली स्तर पर कई स्कूलों के प्रधानाचार्यों ने अपने-अपने संस्थानों में खेलों तथा अन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कार्य किया है और उसके परिणामस्वरूप उन स्कूलों ने अच्छे खिलाड़ी व कलाकार देश व प्रदेश को दिए हैं। स्कूल प्रमुख चाहे तो खेल के लिए वह विद्यालय में अच्छा वातावरण आसानी से उपलब्ध करवा सकता है तथा खेल मैदान व खेल उपकरणों के लिए अन्य मदों से थोड़ा बहुत धन निकाल सकता है।

राज्य सरकार किशोर विद्यार्थियों के लिए पायका खेलों का आयोजन केंद्र से मिले धन से करती आ रही है। इन खेलों में दूसरे दर्जे के खिलाड़ी ही हिस्सा लेते हैं, क्योंकि अच्छे खिलाड़ी स्कूली खेलों के लिए जब अपना अभियान खंड स्तर से शुरू करते हैं, तो राज्य व राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में उनकी बहुत अधिक पढ़ाई छूट जाती है। इसलिए वे फिर अन्य बाहरी प्रतियोगिताओं में नहीं जाते हैं, बल्कि वहीं पर खानापूर्ति करने के लिए खेल विभाग हर किसी दोयम दर्जे के खिलाड़ी को टीम का हिस्सा बना लेता है। कई बार तो महज खानापूर्ति ही होती है, मगर इस पायका टीम को अच्छी कीट तथा अच्छी खुराक केंद्र से मिले धन से मिल जाती है। वैसे तो पिछले दो वर्षों से यह प्रतियोगिता बंद कर रखी है। अगर इसी धन को स्कूली खेलों पर खर्च किया जाए, तो निश्चित तौर पर इसका सही उपयोग होगा। इस ओर विचार किया जाना चाहिए। एक प्रतियोगिता कनिष्ठ स्तर पर जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर उस खेल का खेल संघ राज्य में करवाता है। यह सबसे अधिक मान्य भी है, क्योंकि खेलों के प्रचार-प्रसार का ठेकेदार उस खेल का खेल संघ ही होता है। इन सब प्रतियोगिताओं को केवल स्कूली प्रतियोगिता में समाहित कर लिया जाए तो इससे जहां धन की बचत होगी, वहीं खेलों के साथ-साथ विद्यार्थी खिलाड़ी अपनी पढ़ाई भी साथ में सुचारू रूप से कर सकता है।

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