पीके खुराना

फर्क एक ही है संन्यासी और संसारी में कि संसारी लिप्त है, ग्रस्त है, पकड़ा हुआ है, जाल में बंधा है। संन्यासी भी वहीं है, लेकिन किसी भी क्षण जाल के बाहर हो सकता है। पीछे लौट कर नहीं देखेगा। संन्यासी वही है जो पीछे लौट कर नहीं देखता। जो हुआ, हुआ। जो नहीं हुआ, नहीं हुआ। जहां से हट गया, हट गया। संसारी ग्रसित हो जाता है, बंध जाता है। ऐसा नहीं है कि महल किसी को बांधते हैं, महल क्या बांधेंगे? हमारा मोह हमें बांध लेता है। इतना ही भेद है। भेद बहुत बारीक है और भेद बहुत आंतरिक है। सम्राट के मन में जो द्वंद्व था वह इस कारण था कि सम्राट सोचता था कि संन्यासी तो त्यागी होता है, त्याग ही उसकी पहचान है और संसारी भोगी। संन्यासी को पर्वत पर रहना चाहिए और संसारी को परिवार में रहकर सारे सुख भोगने चाहिएं। तब सम्राट को यह ज्ञान न

आत्महत्या के जितने भी मामले होते हैं उनके पीछे एक मुख्य कारण यह भी है कि आत्महत्या करने वाले के पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उनकी बात सुनता, समझता, उन्हें धीरज बंधाता और उनमें जीवन की जिजीविषा को, जीवन जीने की चाह को फिर से जगाता। लब्बोलुबाब यह कि परिवार में, समाज में, व्यवसाय में, पेशेवर जीवन में रहते हुए हम बातचीत की कला सीखें या न सीखें, सुनने की कला में महारत अवश्य हासिल करें ताकि जीवन सुखमय हो जाए। हम सब में दुनिया बदलने की ताकत है, पर इसकी शुरुआत खुद से होती है। कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होता है, खुद को तैयार करना होता है, अपनी योग्य

धरती, पानी, हवा और रोशनी जीवनदायी वरदान हैं, भोजन हमें पुष्ट करता है, लकड़ी, पत्थर, लोहा आदि पदार्थ विभिन्न वस्तुओं में ढलकर हमारे सुख और सुविधा का कारण बनते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में हम हर वस्तु के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना सीखते हैं। ये सब जड़-चेतन वस्तुएं ही परमात्मा हैं। परमात्मा कहीं और नहीं है। इन सबमें परमात्मा विद्यमान है। यही कारण है कि अध्यात्म की दुनिया में हमें यह सिखाया जाता है कि हम सबसे प्रेम करें, अनायास प्रेम करें, अकारण

उन्नीसवीं सदी के महान रूसी लेखक लियो टॉलस्टाय ने तो यहां तक कह डाला कि किसी मूर्ख को भी कोई नई बात समझाई जा सकती है, बशर्ते कि उसने उस विषय पर पहले से ही अपना कोई मत न बना रखा हो, लेकिन किसी मूर्धन्य विद्वान को वही बात समझाना लगभग असंभव है जिसने उस विषय पर अपना मत दृढ़ कर रखा हो। सच, झूठ, विचार और विश्वास की यह कहानी मन की सीमाओं को रेखांकित करती है और हमें यह सबक देती है कि रिश्तों में विश्वास को बहुत महत्व है। यदि सामने वाले व्यक्ति को हम पर विश्वास न हो तो हम चाहे जो कर लें, अपनी बात उसे न समझा सकते हैं, न मनवा सकते हैं। पति-प

एक ऐसा व्यक्ति जिससे हम अक्सर असहमत रहते हों, या ऐसा व्यक्ति जो हमें पसंद न हो, वह कोई ऐसा तथ्य हमारे सामने लेकर आए जो हमारे पुराने विश्वासों पर खरा न उतरता हो तो हम बिना किसी विश्लेषण के उस तथ्य को अस्वीकार कर देंगे, इसलिए नहीं कि वह तथ्य, तथ्य नहीं था, बल्कि इसलिए कि नया तथ्य बताने वाला वह व्यक्ति हमारे विचार में हमारे अनुरूप नहीं था। लेकिन वही तथ्य अगर कोई ऐसा व्यक्ति बताए जो हमें बहुत पसंद है तो हम अपना विचार बदलने में ज्यादा देर नहीं लगाते। यहां तक कि कोई ऐसा व्यक्ति जो हमारे लिए अनजान है, लेकिन हम उसे नापसंद नहीं करते तो उसके बताए किसी ऐसे तथ्य को हम स्वीकार कर सकते हैं जो हमारे स्थापित विश्वास से मेल न खाता हो। या हम कम से कम उस नए विचार के मंथन के लिए राजी हो जाते हैं...

प्रतिभा के बिना लगन हमेशा सर्वश्रेष्ठ परिणाम नहीं दे सकती। सचिन तेज गेंदबाज होना चाहते थे, लेकिन डेनिस लिली ने समझ लिया कि उनमें तेज गेंदबाज बनने की काबीलियत नहीं है, इसलिए उन्होंने सचिन को अपनी बल्लेबाजी पर ध्यान देने की सलाह दी, और सचिन ने अपना फोकस बदला तो फिर उन्हें कभी पीछे मुडक़र देखने की आवश्यकता नहीं पड़ी। क्रिकेट कोच रमाकांत अचरेकर ने उनकी प्रतिभा को संवारा, तराशा और उन्हें अन्य बच्चों की तरह सुबह-सवेरे मैदान के चक्कर लगाने को नहीं कहा। अचरेकर उनसे मैदान के चक्कर तब लगवाते थे जब वे बल्लेबाजी करके थककर चूर होते थे और वो भी हाथ में बल्ला उठाए और पैड पहने हुए...

एक बार की सफलता हममें नया आत्मविश्वास जगाती है और आगे की सफलताओं की राह खोल देती है, क्योंकि तब हम जान जाते हैं कि भविष्य के हर काम, हर उत्तरदायित्व को ठीक से निभाने का गुर उस अकेले काम पर केंद्रित हो जाना है। जीवन का यह नियम अनमोल है कि जो काम हमारे सामने है, वही सबसे महत्वपूर्ण है। इसी तरह जो व्यक्ति हमारे सामने है, वही सबसे महत्वपूर्ण है, और जो समय हमारे सामने है, यानी, वर्तमान समय, वही समय किसी भी नए काम को शुरू करने का शुभ समय है। जीवन में सफल होने और खुश रहने के कुछ बहुत साधारण नियम हैं। ये नियम बहुत आसान हैं, बहुत व्यावहारिक हैं और बहुत लाभदा

ह्वाट्सऐप, फेसबुक, टेलिग्राम, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टिंडर आदि पर समय बर्बाद करने वाले हम सब चौथे बंदर हैं जिन्हें गांधी जी तो नहीं देख पाए, पर इन आभासी मंचों के मालिक अपने-अपने बंदरों को देख रहे हैं और मजे ले रहे हैं। उनकी मार्केटिंग की रणनीति हमारी आदतों के अनुसार बनी हुई है। हमने जिस तरह की पोस्ट को क्लिक किया, पसंद किया, टिप्पणी की, किस विज्ञापन को देखा, कितनी देर देखा, उस पर क्या प्रतिक्रिया की, इन सब बातों की खबर इन लोगों को तुरंत हो जाती है और उनका सिस्टम हमें उसी तरह की पोस्ट और विज्ञापन दिखाने शुरू कर देता है। हमारी अपनी कोई प्राइवेसी नहीं है। हमारा डेटा न जाने किस-किस को बेचा जा रहा है और हर मार्केटिंग कंपनी हमारी आदतों, हमारी पसंद, हमारे खर्च करने के पैटर्न और मासिक खर्च आदि का ब्योरा रख रही है और हमें ऐसे उत्पादों का सुझाव दे रही है जिनकी हमें आवश्यकता नहीं है...

वक्त बनाने के लिए खुद को व्यवस्थित करना होता है, अपना आलस्य छोडऩा होता है। सफलता आसान नहीं होती। सफलता अपनी कीमत मांगती है। सफलता आपकी सारी ऊर्जा चाहती है, सारा ध्यान चाहती है। निकम्मा आदमी किसी काम का नहीं। जो आदतन परजीवी बने रहते हैं, दूसरों की मदद के तलबगार बने रहते हैं, वे ही असफल होते हैं। सपनों की पूर्ति के लिए काम करते समय कुछ घबराहट का होना, थोड़ा-बहुत डर, सामान्य सी बात है। और यह वस्तुत: अच्छा है क्योंकि संयमित डर के कारण हम सभी आवश्यक सावधानियां बरतते हैं जिससे असफलता की आशंका कम हो जाती है। मैं इसे संयमित डर कहता हूं