भरत झुनझुनवाला

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक सारांश है कि इस्लाम और पश्चिमी सभ्यता दोनों में समानता की विचारधारा गहरी है। लेकिन इस्लाम में समानता के इस मंत्र को सुन्नाह ने खारिज कर दिया, जबकि पश्चिमी सभ्यता ने इस मंत्र को अपने देश तक सीमित करके खारिज कर दिया। अतः दोनों में सुधार की जरूरत है। इस्लाम को

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक यदि कोई राज्य अतिरिक्त राजस्व एकत्रित करना चाहता है तो वह जीएसटी अथवा आय कर की दरों में वृद्धि कर इस रकम को अर्जित कर सकता है जिससे कि इसका उपयोग जनहित के लिए किया जा सके। हमें तत्काल जीएसटी की दरों को निर्धारित करने में राज्यों को स्वायत्तता देनी चाहिए

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक आयात कर को बढ़ाने में विश्व व्यापार संगठन आड़े नहीं आता है। इसलिए सरकार के पास विकल्प है कि बीते छह वर्षों से लागू की जा रही हानिप्रद नीति का त्याग करे और आयात करों में भारी वृद्धि करे। वर्तमान में जो औसत आयात कर 20 प्रतिशत है, उसको तत्काल दो

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक हमारी उत्पादन लागत कम करने के लिए यह जरूरी है कि हम आधुनिकतम तकनीकों का उपयोग करें लेकिन उद्यमियों के पास इन तकनीकों को हासिल करने की क्षमता नहीं होती है, इसलिए सरकार को उन्हें मदद करनी चाहिए जिससे कि हम उत्पादित माल आधुनिक तकनीकों से सस्ता बना सकें। तीसरा, स्थानीय

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक सरकार को चाहिए कि इस प्रकार की व्यवस्था बनाए जो जमीनी स्तर पर सरकारी नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करे। जैसा कि श्री सिकरी ने कहा है कि स्वीकृति मिलने में समय कम लगे और बिजली का दाम कम हो जाए और हमारे उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े हो सकें। सरकार

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक मेरा मानना है कि हमें यूरोपीय यूनियन से सबक लेना चाहिए। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी ने फ्रांस के ऊपर कब्जा किया था। इसके बावजूद ये दोनों बड़े देश यूरोपियन यूनियन में आज बराबर के सदस्य हैं। इसी क्रम में हमें प्रयास करना चाहिए कि चीन से अपने सरहद के विवाद

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक भारत में हर प्रकार का मौसम देश के किसी न किसी हिस्से में उपलब्ध रहता है। जैसे जाड़े के समय में गुलाब के फूल दक्षिण भारत में उत्पादित हो सकते हैं और गर्मी के समय इन्हें पहाड़ में उत्पादन किया जा सकता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि हर राज्य में

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक इस अवधि में इनका उत्पादन प्रभावित हुआ है और अपने को जीवित रखने के लिए इन्होंने ऋण लेकर अपने को जीवित रखा है जैसे आईसीयू में मरीज को कुछ समय के लिए भर्ती किया जाता है। इस ऋण को विकास नहीं मान सकते हैं। यह ऋण लेना संकट को बताता है।

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक इस परिप्रेक्ष्य में लोकतंत्र और तानाशाही दोनों में संकट दिखता है। लोकतंत्र में घरेलू खुलापन मिलता है जो कि मानव सभ्यता के लिए लाभप्रद होता है, लेकिन साथ में निश्चित रूप में दूसरे देशों का शोषण होता है। इसके विपरीत तानाशाही दोनों तरह से चलती है ः विकास एवं हृस। तानाशाही