पीके खुराना

इन बारह यज्ञों का समग्र दार्शनिक निष्कर्ष यही है कि मोक्ष कोई कर्म-रहित अवस्था नहीं, बल्कि अज्ञान-रहित अवस्था है। गीता कर्म को त्यागने का नहीं, कर्म में स्थित अज्ञान को त्यागने का आग्रह करती है। जब कर्म विवेक, संतुलन और साक्षीभाव से किया जाता है, तब वही कर्म यज्ञ बन जाता है और वही यज्ञ ब्रह्म-बोध का मार्ग खोलता है। इस प्रकार बारह यज्ञ मनुष्य को कर्म से दूर नहीं, बल्कि कर्म के भीतर सत्य तक पहुंचाते हैं, यही गीता का दार्शनिक शिखर है, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित है। इन सभी यज्ञों का संयुक्त व्यावहारिक निष्कर्ष यही है कि गृहस्थ जीवन में साधना का अर्थ जीवन से भागना नहीं, बल्कि जीवन में जागना है। जब हम अपने कर्मों में सजगता, संबंधों में करुणा और इच्छाओं में विवेक ले आते हैं, तब घर ही आश्रम बन जाता है...

यह मौन जीवंत होता है क्योंकि इसमें डर नहीं होता। इसलिए जब कोई कहता है, ‘मुझे नहीं पता’ और इस स्वीकारोक्ति के बाद भी वह खुले दिल से हंस सकता है, तो समझ लेना चाहिए कि वह व्यक्ति मुक्त हो रहा है। मुक्त किसी बंधन से नहीं, बल्कि जानने के अहम से। मानव इतिहास का अधिकांश हिस्सा उत्तरों की खोज का इतिहास है। दर्शन, धर्म, विज्ञान, सबने प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया है। लेकिन एक स्तर ऐसा भी है जहां प्रश्न और उत्तर दोनों ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। जब यह बोध गहराता है कि हमारे पास कोई अंतिम उत्तर नहीं है, तब अस्तित्व का बोझ हल्का हो जाता है, क्योंकि अब हम सत्य के स्वामी नहीं, उसके सहभागी बन जाते हैं। यह अवस्था निहिलिज़्म नहीं है, यह बौद्धिक परिपक्वता है। यहां अर्थ नष्ट नहीं होता, बल्कि कृत्रिम अर्थ गिर जाता है

जब मशीन चुप हो जाती है, तब चमत्कार घटता है। प्रार्थना कोई मांग नहीं है। प्रार्थना समर्पण है। यही कारण है कि एक शांत क्षण, हजार बेचैन प्रयासों से ज्यादा प्रभावी होता है। सच तो यह है कि बेचैनी में किया गया कर्म या तो भ्रम से जन्मता है, या अहंकार से, और मौन से जन्मा कर्म साधना बन जाता है। जब कर्म मौन से निकलता है, तब परिणाम की जल्दी नहीं रहती। जीवन बीज की तरह है, उसे समय चाहिए, धैर्य चाहिए, भरोसा चाहिए। हम चमत्कार को पहचान नहीं पाते, क्योंकि हम शोर की उम्मीद करते हैं। चमत्कार दरअसल बहुत शांत चीज है। इतना शांत कि अक्सर लोग उसे पहचान ही नहीं पाते। क्योंकि आदमी को शोर पसंद है- टीवी तेज चले, मोबाइल बजे, दिमाग दौड़े। चमत्कार चुपचाप आता है, और हम चुप रहना ही भूल चुके हैं...

जब दिन में प्रकाश मिलता है तो यह घड़ी सक्रिय रहती है और मेलाटोनिन कम बनता है, रात में अंधेरा बढ़ते ही मेलाटोनिन का निर्माण शुरू होता है, जो नींद लाता है। हम ऐसा करेंगे तो जल्दी समझ पाएंगे कि रात में भी यदि हम मोबाइल की तेज रोशनी, टीवी और लैपटॉप को लगातार देखते रहें, तो मस्तिष्क को प्रकाश का भ्रम मिलता है। वह मान लेता है कि अभी दिन है और मेलाटोनिन बनना रुक जाता है। इस कारण नींद दूर भागने लगती है। रात्रि के अनुशासन पर इसीलिए जोर दिया जाता है। नींद तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो हमारे सहज होने पर खुद ही आ जाती है। अनिद्रा एक समस्या नहीं, बल्कि मन की पुकार है। हम इस पुकार को सुनेंगे, अपने भीतर की धूल झाड़ेंगे, थोड़ी-सी रोशनी अंदर रहने देंगे, और जीवन में शांति के लिए थोड़ी-सी जगह बना देंगे तो नींद हमारे तकिये पर लौट आएगी...

बाहरी संसार चाहे जैसा हो, पर भीतर की व्यवस्था मजबूत हो जाए तो मन की दशा भी संतुलित रहती है और दिशा भी स्पष्ट रहती है। जीवन में संतुलन आवश्यक है। न तो अत्यधिक आसक्ति से खुशी मिलती है, न अत्यधिक त्याग से। संतुलन का मार्ग ही वह जगह है जहां मन शांत रहता है, कार्य सहज होते हैं और संबंध सहजता से बहते हैं। जब हम संतुलन में होते हैं तो रिश्तों में भी स्पष्टता आती है, हम कम अपेक्षा करते हैं, ज्यादा समझते हैं और कम आहत होते हैं। जो बदल रहा है उसे पकडऩे की कोशिश नहीं करनी चाहिए। परिस्थितियां, लोग, स्थितियां, सब अपने समय के अनुसार बदलते हैं। हम जब परिवर्तन को स्वीकार करते हैं, तब मन में संघर्ष कम होता है...

पूछने से निर्णय सही होते हैं। पूछने से हम दूसरों की पीड़ा को भी समझ पाते हैं और अपनी सीमाओं को भी। जीवन का सरल नियम यह है कि सोचने से नहीं, पूछने से संबंध बनते हैं। यह संसार संबंधों पर आधारित है। संबंधों की जड़ प्रेम है और प्रेम की जड़ संवाद है। संवाद का पहला कदम पूछना है। जो पूछता है, वह जोड़ता है। जो सोचता है, वह या तो तोड़ देता है, या उस स्थिति में पहुंच जाता है। ‘मैंने सोचा’ का तरीका जीवन का सबसे बड़ा पत्थर है जो रिश्तों, अवसरों, समझ और प्रेम के प्रवाह को रोक देता है। ‘मैंने पूछा’ का तरीका जीवन की एक बड़ी कुंजी है जो हर बंद दरवाजा खोल देती है। पूछना और समर्पण दुनियादारी का ही नहीं ब

मन थकता है ओवरथिंकिंग से, दूसरों की अपेक्षाओं का बोझ उठाने से, अपनी भावनाओं को दबाने से, अतीत ढोने से, भविष्य की चिंता में उलझने से, नकली मुस्कानों और नकली रिश्तों से, खुद के विरुद्ध जाकर जीने से। मन की थकान का असली कारण यह है कि हम मन का खयाल नहीं रखते। मन सोचने के लिए है, ढोने के लिए नहीं। मन की थकान मिटाने का एक ही रास्ता है, और वह है, मन से दोस्ती। मन कोई दुश्मन नहीं है। मन कोई पापी, कोई गलत, कोई बाधा नहीं है। मन थकता है क्योंकि उसे लंबी यात्रा अकेले करनी पड़ रही है, हम साथ नहीं दे रहे। मन की थकान तब मिटती है जब हम अपने मन को जगह देते हैं। थोड़ी खामोशी, थोड़ी स्वीकृति, थोड़ी सच्चाई, थोड़ी ईमानदारी और थोड़ी प्रेम की गर्माहट, बस इतना ही चाहिए मन को। जब मन को आराम मि

जब व्यक्ति केवल साथी से ही प्रेम की अपेक्षा करता है, तब संबंध असंतुलित हो जाता है। परंतु जब वह अपने भीतर भी प्रेम उगाता है, तब संबंध खिल उठता है। कई बार व्यक्ति के भीतर गहरी भावनात्मक चोटें होती हैं। जब कोई हमें छोड़ दे, अलग हो जाए, या हमें अस्वीकृत कर दे, लगातार हमारी उपेक्षा करता रहे तो भावनात्मक चोट सचमुच गहरी होती है और आज के प्रेम में अक्सर दिखाई देती हैं। इन घावों को समझने और भरने के लिए संवाद महत्वपूर्ण है, पर कभी-कभी किसी अनुभवी मार्गदर्शक, किसी चिकित्सक, या किसी गुरु की शरण भी आवश्यक होती है, क्योंकि कुछ घाव ऐसे होते हैं जो अकेले नहीं भरे जा सकते, उन पर प्रेम, करुणा और समझ की मरहम लगानी होती है...

भजन का अर्थ है मन को भीतर की ओर मोडऩा, थोड़ा ठहरना, थोड़ा सुनना, थोड़ा विसर्जित होना। आज पूरी दुनिया सुविधाओं से भरी है। स्मार्टफोन, एसी, नेटफ्लिक्स, ऐप्स, ट्रिप्स, पर ‘स्व’ की यात्रा वहीं की वहीं खड़ी है। हम कह डालते हैं कि समय नहीं मिलता, पर यह भूल जाते हैं कि जिसके लिए समय नहीं मिलता, वही तो हमारा असली खजाना है। मनुष्य जन्म कोई दंड नहीं है, कोई पुरस्कार भी नहीं है, यह एक मौका है अपने भीतर के फूल को खिलाने का। अपने भीतर के ईश्वर को पहचानने का, उस तक पहुंचने का। यह जीवन हमें केवल जीने के लिए ही नहीं, बल्कि जागने के लिए मिला है। सवाल यह है कि जागें कैसे? जागरण की लिव लग जाए तो समझ आ जाता है कि जागरण की पहली सीढ़ी है, सांसों पर ध्यान, दूसरी सीढ़ी है मौन...