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भूपिंदर सिंह (लेखक, पेनलटी कार्नर पत्रिका के संपादक हैं) हिमाचल के युवक रोज सुबह-शाम सड़कों पर दौड़ते देखे जा सकते हैं, मगर अधिकतर सेना तथा सुरक्षा बलों में भर्ती के लिए ही अभ्यास करते हैं। अच्छी धाविकाएं भी राज्य पुलिस तथा वन विभाग में भर्ती होकर चली जा रही हैं। इसलिए विश्वविद्यालय खेलों में बेहतर

पीके खुराना लेखक ( वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) आज कहीं भी कोई बांध बनने लगे, बिजलीघर बनने लगे, टेलीकॉम कंपनी का टावर लगने लगे, सड़क बनने लगे, नहर खुदने लगे, कहीं न कहीं से कोई न विरोधी जत्था निकल ही आता है। बात-बात पर संसद ठप हो जाती है, बंद का आयोजन

डा. भरत झुनझुनवाला ( लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं ) दवाओं के मूल्य न्यून बने रहें, इसके लिए दूसरे कदम भी सरकार को उठाने चाहिए। पहला कदम है कि सामान्य दवाओं पर ब्रांड लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। साथ-साथ डाक्टरों पर प्रतिबंध लगाया जाए कि वे जेनेरिक दवाओं की पर्ची लिखें व निर्माता

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ( लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं ) संस्कृत का सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि यदि उसको जानने वाले और व्यवहार में लाने वाले लोग तैयार होते हैं, तो उन लाखों पांडुलिपियों को पढ़ा जा सकता है जो अभिलेखागारों में दीमक का शिकार हो रही हैं। भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और

प्रो. एनके सिंह (लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं) हम कार्य की ऐसी परंपरा विकसित करने में नाकाम ही रहे हैं, जिसमें भिन्न पृष्ठभमि व विचार के अवयवों के साथ काम किया जा सके। आम तौर पर परिषद और महापौर के बीच मतभेद होता है और परिषद के सदस्य इस स्थिति से

पीके खुराना लेखक ( वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) नालेज इकॉनोमी में बड़े शहरों के दायरे से बाहर निकल कर कस्बों और गांवों को उद्योग और रोजगार का केंद्र बनाने की अपार संभावना है। यह खुशी की बात है कि इंटेल जैसी कई निजी कंपनियां भी इस उद्देश्य में सहयोग देकर अपने प्रयासों

डा. भरत झुनझुनवाला (लेखक, आर्थिक विश्लेषक  एवं टिप्पणीकार हैं) देखना चाहिए कि उपभोक्ता पर न्यूनतम भार डाल कर अधिकतम रोजगार की रक्षा किन क्षेत्रों में हो सकती है। केवल ई-रिटेल पर प्रतिबंध लगाकर किराना की रक्षा करने से बात नहीं बनेगी चूंकि तमाम दूसरे क्षेत्रों में रोजगार का भक्षण जारी रहेगा। प्रतीत होता है कि

कुलदीप नैयर ( लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं ) यदि कांग्रेस अपने खोए हुए प्रभाव को पुनः हासिल करना चाहती है, तो इसकी शुरुआत उसे अपने घर की साफ-सफाई से करनी होगी। कांग्रेस पार्टी के लिए भी सेकुलरिज्म महज एक शब्द बनकर रह गया है और इसके कई नेताओं में इतनी कट्टरता भर चुकी है, जितनी

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री (लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं) महबूबा ने एक बहुत ही तल्ख प्रश्न किया। कहा जाता है कि बच्चे पेलेटगन का शिकार हो रहे हैं, लेकिन कोई बताएगा कि ये बच्चे क्या सुरक्षा बलों की चौकियों पर दूध लेने जाते हैं? महबूबा मुफ्ती की इस खरी-खरी से उमर और गुलाम दोनों ही तिलमिलाए