पीके खुराना

इस बार की ड्राइविंग में बस एक ही फर्क था कि हर ड्राइवर को एक शानदार, नई-नकोर लग्जरी कार चलाने को दी गई। इस बार भी जब सभी लोग गंतव्य स्थान पर पहुंच गए तो ड्राइविंग के समय के उनके व्यवहार का विश्लेषण किया गया तो पाया गया कि इस बार चालीस लोगों ने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया था। सौ में से चालीस लोग, यानी चालीस प्रतिशत लोगों ने ट्रैफिक के नियमों का सम्मान करना आवश्यक नहीं समझा था। दोनों बार वही ड्राइवर थे, वही रूट था, वही नियम थे, फिर क्यों हुआ ऐसा कि चालीस प्रतिशत ड्राइवरों ने ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। इस प्रयोग के और इस विश्लेषण के मायने क्या हैं? इस प्रयोग से हम क्या सीख सकते हैं? यहां ध्यान देने की जो सबसे आवश्यक बात है, वो यह है कि प्रयोग में शामिल सभी लोगों की कारें अपनी नहीं थी...

मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण अथवा कैवल्य कही जाने वाली यही वह स्थिति है जब हम जिंदा होते हुए भी मृत्यु के पार का सच जान लेते हैं और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष पा लेते हैं। इस मामले में एक सामान्य व्यक्ति और किसी सिद्ध योगी के अनुभव के अंतर को समझना हो तो हम कह सकते हैं कि जब हम गहरी नींद में आराम कर रहे होते हैं तो उस स्थिति में भी हमारा मन और चित्त जागृत रहकर सजग रहते हैं तथा जीवात्मा शरीर से निकल कर मन के साथ भ्रमण करती है। सामान्य भाषा में तब हम स्वप्न की स्थिति में होते हैं, सपना देख रहे होते हैं, पर स्वप्न में जो कुछ होता है, हम उसे नियंत्रित नहीं कर सकते, बद

हमारे पास धन होगा तो हम कई चुनौतियों का सामना आसानी से कर सकते हैं, आत्मविश्वास से निर्णय ले सकते हैं और सिर उठाकर जी सकते हैं। हमारे पास धन होगा तो हम किसी की सहायता कर सकते हैं, समाज सेवा कर सकते हैं। समस्या धन नहीं है, धन का लोभ है। हम लोभ से बचे रहें तो धन एक अच्छा साधन है, अच्छा औजार है, अच्छा टूल है। धन की महत्ता को कम करके आंकने के बजाय हम यह ध्यान रखें कि हम धन के स्वामी हों, धन हमारा स्वामी न बन जाए। धन हमारे लि

ब्रह्मचारी की आंखें फटी की फटी रह गईं। जिसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी, उसे दस सोने की मोहरें मिल चुकी थीं, और एक हजार मोहरें और भी मिल रही थीं। ब्रह्मचारी ने सोचा कि अगर मैंने दस मोहरों से कोई व्यवसाय ही करना है तो ब्रह्मचर्य के व्रत के कोई मायने नहीं हैं। अच्छा घर बनाऊंगा, बड़ा व्यवसाय करूंगा, आज तक जो शिक्षा मिली, इतनी ही काफी है। गुरु जी के पास जाने की जरूरत भी नहीं है। यह प्रस्ताव स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है। थोड़ी-बहुत आनाकानी के बाद ब्रह्मचारी ने महिला का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अब वह महिला ठठाकर हंस पड़ी और बहुत कोमल स्वर में बोली कि ब्रह्मचारी जी

संतुष्ट रहना, खुश रहना, क्रोध न करना, उदास न होना, भयभीत न होना, निराश न होना, बेईमानी न करना, झूठ न बोलना, किसी को गुमराह न करना, चुगली न करना, निंदा न करना, शिकायत न करना, किसी दूसरे की भूल को या गलती को माफ कर देना, खुद अपनी गलतियों और कमियों के प्रति सहनशील होना आदि हमारी खुशी की गारंटी हैं जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। यह मन की सेवा है। सबके भले के लिए सोचना, दूसरों की सहायता करना, किसी को मार्गदर्शन देना, समाज के भले के लिए काम करना, सबसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करना आदि जन की सेवा के उदाहरण हैं। अपने लिए समय निकालना, आत्ममंथन करना आदि मनन की सेवा कहलाता है। इस प्रकार जब हम निरंतर आनंदित रहते हुए जीवन को उत्सव में बदल देते हैं तो जीवन सार्थक हो जाता है...

हम धन की निंदा नहीं करते, धन को बुरा नहीं मानते, हम सब गृहस्थ संन्यासी हैं और हमने न घर छोड़ा है, न परिवार छोड़ा है, न दुनिया छोड़ी है। हम सब अपनी-अपनी नौकरी या व्यवसाय में लगे हैं। हम मानते हैं कि धन का दुरुपयोग बुरा है, धन का लालच बुरा है, धन के लिए धोखा देना, झूठ बोलना या ठगना बुरा है, खुद धन बुरा नहीं है, अमीर होना बुरा नहीं है, गरीबी कोई गुण नहीं है, अमीरी कोई दुर्गुण नहीं है। धन हो तो अच्छी शिक्षा लेना, दुनिया देखना, जोखिम लेना और किसी की सहायता करना आसान हो जाता है। धन हमें अपने ढंग से जीने की स्वतंत्रता देता है, धन हमें समय के सदुपयोग की स्वतंत्रता देता है, धन हमें

प्रसन्नता के आलम में किए गए काम हमारे मानसिक स्वास्थ्य का बीमा हैं तो प्रसन्नता के आलम में किया गया भोजन एक दवाखाने की तरह पुष्टिदायक हो जाता है। शाकाहारी भोजन करने वालों के लिए एक बात और ध्यान देने योग्य है। शाकाहारी और मांसाहारी, यानी वेज और नॉन-वेज, दोनों तरह का भोजन परोसने वाले होटल, ढाबे या रेस्टोरेंट में दोनों तरह के भोजन के लिए न तवा अलग होता है, न कड़ाही। यानी, अगर आप शाकाहारी हैं और ऐसे किसी होटल या रेस्टोरेंट में खाना खा रहे हैं जहां वेज और नॉन-वेज दोनों तरह का भोजन सर्व होता है तो पक्का मानिये कि आपके भोजन में नॉन-वेज भोजन का अंश आएगा ही आएगा। यहां

अगर मैं एक अध्यापक हूं और अपना परिचय देते समय जब मैं कहता हूं कि मैं एक अध्यापक हूं और मैं यह सुनिश्चित करता हूं कि मेरे विद्यार्थी मेरे द्वारा पढ़ाए गए पाठ को अच्छी तरह से समझें और अच्छी आदतों को जीवन में उतारें, तो मैं इसमें अपना दिल जोड़ रहा हूं, अपनी भावनाएं जोड़ रहा हूं। पर क्या इतना ही काफी है? जी नहीं, मुझे इस वाक्य के साथ अपना दिमाग भी जोडऩा है। यानी, पढ़ाते समय मुझे यह सुनिश्चित भी करना होगा कि मेरे विद्यार्थी मेरे द्वारा पढ़ाए गए पाठ को सचमुच अच्छी तरह से समझ सकें, मुझे उसके लिए अपनी भाषा पर ध्यान देना हो, पढ़ाने के या सिखाने के तरीके पर ध्यान देना हो, उसके लिए कोई समुचित र

किसी दुर्घटना में आंखें खो चुके मरीजों का मुफ्त इलाज करके उनकी आंखें वापस लाने का अनूठा काम भी डा. ग्रेवाल सरीखा कोई व्यक्ति ही कर सकता है। अभिनय, फोटोग्राफी, नृत्य, संगीत आदि कलाओं में महारत पाने के लिए जिस संयम, धीरज और लगातार अभ्यास की आवश्यकता होती है, वह व्यक्ति को संवेदनशील बनाती हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति जब अपने धन अथवा समय को जनसेवा के कार्यों के लिए भी समर्पित करता है तो वह सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक हो जाता है। पंद्रहवीं शताब्दी के भक्ति साहित्य के श्रेष्ठ कवि नरसी भगत के मूल गुजराती भजन का हिंदी रूपांतरण ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने